हेमंत सोरेन के आदिवासी कभी हिंदू न थे के बयान पर क्यों है विवाद ?

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने हालिया दिनों में हार्वर्ड इंडिया कॉन्फ्रेंस के वर्चुअल संबोधन में आदिवासी धार्मिक संहिता का मुद्दा उठाया था . ,अपने बयान में कहा है कि आदिवासी कभी हिंदू नहीं थे और ना इनका हिंदू धर्म था. आदिवासी प्रकृतिवाद पर आधारित है और यह प्रकृति के उपासक होते हैं. इन पर हिंदू होने या हिंदुत्व थोपा जाना सैद्धांतिक व्यवहारिक व धार्मिक निजता के दृष्टिकोण से उचित व न्यायसंगत करार नहीं दिया जा सकता . हार्वर्ड इंडिया कॉन्फ्रेंस से ठीक पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में नीति आयोग परिषद की बैठक में सरना कोड पर अपनी बात रखी थी . उनकी मांग है कि झारखंड विधानसभा द्वारा भेजे गए इस प्रस्ताव पर सहानुभूति पूर्वक विचार होना चाहिए . उनके धर्म को मान्यता दी जानी चाहिए और धर्म के कॉलम में उन्हें ट्राईबल या अवोरिजिमल रिलीजन चुनने का विकल्प दिया जाना चाहिये ., सरना आदिवासी धर्म कोड को जनगणना 2021 में शामिल किया जाना चाहिए मुख्यमंत्री सोरेन की अगली योजना इन मांगों को लेकर सत्ता पक्ष के सभी विधायकों के साथ केंद्र सरकार और गृह मंत्री से मिलकर इसे मूर्त रूप दिलाने हेतु आग्रह करने की है .
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झारखंड में आदिवासी का इतिहास और मुख्यमंत्री सोरेन की दलील

झारखंड में 26% आदिवासी हैं. झारखंड के आदिवासी अपने अलग धर्म कोड को लेकर लंबी अवधि से मुखर थे और हैं. रांची की सड़कों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के पुतले भी फुक चुके हैं. इसकी वजह आरएसएस में नंबर दो की हैसियत रखने वाले सहकार्यवाह डॉ कृष्णगोपाल का बयान जिसमें उन्होंने आदिवासी को हिंदू धर्म का हिस्सा बताया था और कहा था कि सरना कोई धर्म नहीं है. आदिवासी भी हिंदू धर्म कोड के अधीन है. आदिवासी के लिए किसी अलग धर्म कोड की जरूरत नहीं है. इससे आदिवासी विरोध में खड़े हो गए थे इसका सशक्त विरोध भी किए थे . इससे स्पष्ट जाहिर है कि आदिवासी अपना अलग धर्म कोड के हिमायती व पक्षधर हैं और लंबी अवधि से इसके लिए संघर्षरत ही नहीं आंदोलनरत भी हैं. वही सरना धर्म कोड प्रस्ताव पारित होने पर रांची की सड़कों पर आदिवासियों की टोलियां जश्न मना रही है जय सरना के नारे लग रहे हैं सड़कें लाल और सफेद धारियों वाले सरना झंडे से पट चुकी है जो इशारा कर रहा है कि आदिवासी को सरना धर्म कोड के अलावे कोई धर्म कोड मंजूर नहीं है. देश की आबादी में लगभग 12 करोड़ का हिस्सा रखने वाले आदिवासियों के सामने फिलहाल एक मुद्दा सरना धर्म कोड है .वैसे तो यह बहुत पुरानी है की आदिवासियों का धर्म कौन सा है या कौन सा नहीं है .लेकिन इस मुद्दे को लेकर दिल्ली जंतर मंतर पर धरना दिए 19 राज्यों के आदिवासी प्रतिनिधियों का मानना है कि जनगणना में या चाहे कहीं भी कोई फार्म भरने की बात आती है तो धर्म के कॉलम में उन्हें ट्राईबल या एबोरिजिनल रिलीजन यानी मूलवासी धर्म चुनने का ऑप्शन दिया जाना चाहिए .उनकी दलील है कि 1951 में जब आजाद भारत में पहली बार जनगणना हुई थी तो आदिवासियों के लिए धर्म के कॉलम में नौवें नंबर पर ट्राइब उपलब्ध था. जिसे बाद में खत्म कर दिया गया , जबकि आदिवासी इस देश के मूल नागरिक है और उनका जन्म से लेकर मृत्यु तक सब कुछ करने के लिए एक अलग रीति रिवाज और परंपरा है .

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के इस बयान का क्या है मायने / मकसद

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का बयान ने आदिवासियों के अहम से जुड़े इस मुद्दे को फिर से जिंदा कर दिया है. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का बयान आदिवासी कभी न हिंदू थे ने देश के दशकों से चले आ रहे इस सवाल को खाद पानी देकर फिर से जीवित कर दिया है..क्योंकि हमारा धर्म क्या है ? यह सवाल आदिवासी समाज हमेशा से करता आ रहा है. लेकिन उन्हें आज तक इस सवाल का जवाब नहीं मिला. कई बार इसके लिए मांग भी उठी ,प्रदर्शन हुए . नेताओं ने वादे किए लेकिन सब कुछ बस हवा-हवाई ही बना रहा . वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर देश में 1042 81 034 आदिवासियों की संख्या है यानी देश की कुल आबादी का 8.5 प्रतिशत आदिवासी हैं ,जो हमेशा से ऐसी मांग करते आए हैं , उन्हें एक अलग धर्म का अधिकार दिया जाए . इसके लिए दिल्ली और देश भर में कई बार प्रदर्शन भी कर चुके हैं , राजनीतिक के मुताबिक दिशोम गुरु शिबू सोरेन के पुत्र मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आदिवासियों की नब्ज टटोलकर अपने पक्ष में गोलबंद करने की रणनीति के तहत इस मुद्दे को अमलीजामा पहनाने का बीड़ा उठाया है. एक बार फिर इस सवाल को सशक्त तौर पर उछाला है और पुरजोर ढंग से इसकी वकालत भी कर रहे हैं . इनकी योजना है कि झारखंड की कुल आबादी का 26 फ़ीसदी हिस्सा आदिवासी की है , मुख्य रूप से प्रकृति ,जंगल ,जमीन और जल के पोषक पक्षधर और संरक्षक होने के नाते गोलबंदी के लिए ये विशेष रूप से जाने जाते हैं. यदि आदिवासियों के हमेशा की सरना धर्म कोड कीं मांग को दिशा व दशा को पैनी धार व मोड़ दिलाने मे सफल रहे तो आदिवासी इनके अटूट पक्षधर समर्थक बन जाएंगे और इसका बड़ा लाभ राजनीतिक और सत्ता के गलियारे में मिलेगा .

क्या आदिवासियों को मिल पाएगा उनका अलग धर्म कोड

पहली बात तो यह है कि झारखंड के आदिवासियों का यह प्रस्ताव अब मोदी सरकार के अधीन व ताले में है .आदिवासी को प्रशासनिक भाषा में शेड्यूल्ड ट्राइब कहां जाता है . सभी ट्राईबल जातियां मूल आदिवासी की कैटेगरी में नहीं आती.. इन्हें इंडीजीनस विपुल माना जाता है. भारत में 5653 विशिष्ट किस्म की जातियां रहती हैं , इनमें से 635 जातियां हैं जिन्हें आदिवासी की कोटि में रखा गया है . भारत में जनजातियों के समूहों की संख्या 250 से 593 के बीच में है .आदिवासियों में सभी जातियां मूल आदिवासी जाति की कैटेगरी में नहीं आती ., हालांकि पूरे देश का आदिवासी समाज एक जैसा नहीं है . यहां भी हर राज्य के आदिवासियों की परंपराएं अलग-अलग है . साथ ही आदिवासी समाज धीरे-धीरे बट रहा है . ज्यादातर आदिवासी आज इसाई धर्म तब्दील हो रहा है .दूसरी तरफ भाजपा और आरएसएस आदिवासियों को हिन्दू व हिंदुत्व का हिस्सा मानकर आदिवासोयों के धर्मांतरण पर लगाम लगाने के लिए सघन अभियान चला रही है . कुल मिलाकर आदिवासियों के इस मुद्दे का फाइनल फेज केंद्र सरकार के पाले में है . इस लिहाज व दृष्टिकोण से तो फिलहाल इस पर कोई ठोस टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी .

मुख्यमंत्री सोरेन के बयान से उभरे कई सवाल

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा हार्वर्ड इंडिया कान्फ्रेंस में आदिवासी के संबंध में दिए गए बयान का भविष्य क्या होगा ? यह तो वक्त ही बताएगा .फिलहाल आदिवासी समाज के अस्तित्व से जुड़े कई अहम सवाल जैसे आदिवासी हिन्दू नही तो कौन है ? इनका धर्म हिन्दू नही तो और क्या है ? इनकी उत्पति कब ,कहां और कैसे हुई ? इनका मूल इतिहास क्या है ? इनकी पुरातन व परंपरागत सभ्यता ,संस्कृति व परंपराएं क्या थी ? आदि अन्य कई अहम बिंदुओं पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा छिड़ना तय माना जा रहा है .

न्यूज़ रूम: वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार प्रो० धीरेंद्र नाथ सिंह

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