आज समाज में सरकारी स्कूल के शिक्षकों का वो सम्मान नहीं रहा जो आज से कुछ दशक पहले हुआ करता था । ये समाज के साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए चिंता का विषय होना चाहिए ।
शिक्षकों का सम्मान क्यों और कैसे कम हुआ ? इसके लिए कौन उत्तरदायी है ? यह एक लम्बी बहस का विषय है !  कई पक्ष उत्तरदायी हैं। समझते हैं कुछ बेहद प्रभावी कारणों को..


स्वयं शिक्षक –


” शिक्षण व्यवसाय नहीं, साधना है “
आज बहुत कम हीं ऐसे शिक्षक हैं जो स्वयं को विद्यार्थी समझते हैं । शिक्षक का पद पाते हीं वे केवल अध्यापन करते हैं अध्ययन नहीं। एक शिक्षक को सदैव विद्यार्थी होना चाहिए। ज्ञान की कोई सीमा नहीं है और अच्छे शिक्षक को सदैव ज्ञानार्जन करते रहना चाहिए । समय के साथ हुए परिवर्तनों का ज्ञान शिक्षक को होना हीं चाहिए तभी राष्ट्र शिखर पर पहुँचेगा । वर्तमान समय में सरकारी शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन मिलता है, जिसमें उनका तथा उनके परिवार का भली-भाँति भरण-पोषण हो सकता है, फिर भी लालच के कारण उनका स्कूल में न पढ़ाकर ट्युसन पढ़ाना ,बच्चों से पैसे की उगाही करना उनके पतन का एक बड़ा कारण है । आज कई शिक्षक समय से आते-जाते तो हैं पर इस आने-जाने के बीच वे पढ़ना-पढ़ाना भूल चुके हैं । केवल ससमय उपस्थिति दर्ज करने मात्र से उनका दायित्व खत्म नहीं हो जाता है ।
अन्य कोई भ्रष्टाचार में लिप्त हो तो भी समाज एक क्षण के लिए उसे क्षमा कर सकता है किन्तु , भ्रष्टाचारी शिक्षक को समाज कभी माफ नहीं करता है। इसका कारण है कि आज भी समाज में शिक्षक को जो स्थान प्राप्त है वो किसी अन्य व्यक्ति को प्राप्त नहीं है ।
” शिक्षक समाज के आदर्श होते हैं ।” किसी एक शिक्षक के नैतिक पतन से सम्पूर्ण शिक्षक समाज पर आघात लगता है, इसलिए शिक्षक स्वयं अपने विषय के जानकार और उच्च चरित्रधारक बनें । आज भी हमारे बीच कई शिक्षक हैं जिन्होंने अपने उत्कृष्ट कार्यों से समाज के सामने आदर्श प्रस्तुत किया है। ऐसे शिक्षकों को नमन किया जाना चाहिए.


शिक्षकों के चयन की प्रक्रिया …


आज शिक्षकों के चयन का आधार केवल विषय का ज्ञान है जबकि उसके नैतिक, चारित्रिक, मनोवैज्ञानिक और मानवीय गुणों की परीक्षा भी होनी चाहिए । शिक्षक राष्ट्र निर्माता होते हैं तथा नैतिक और मानवीय मूल्यों के बिना राष्ट्र निर्माण की कल्पना बेमानी है । इतिहास गवाह है कि ” रावण से बड़ा ज्ञानी और पंडित कोई नहीं था ।” फिर भी नैतिक और चारित्रिक पतन के कारण हर वर्ष रावण दहन किया जाता है । शिक्षकों की नियुक्ति नियमित शिक्षक के रूप में हो । किसी भी सूरत में संविदा पर शिक्षकों की नियुक्ति नहीं होनी चाहिए । संविदा के शिक्षक स्वयं संतुष्ट नहीं होते हैं । यदि शिक्षक स्वयं हीं असंतुष्ट होंगे तो छात्र,समाज और राष्ट्र को कैसे संतुष्ट कर पायेंगे ? शिक्षकों को प्रर्याप्त वेतन और सम्मान मिलना हीं चाहिए।


सरकारी तंत्र..


समय बदला है किन्तु आज भी भारतीय संस्कृति में शिक्षक का स्थान ईश्वर से भी उपर माना जाता है। आज कई बार शिक्षकों को निरीह प्राणी समझकर उनके साथ दुर्व्यवहार भी कर दिया जाता है। स्कूल के निरीक्षण के क्रम में जाने वाले पदाधिकारियों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे शिक्षकों को पर्याप्त सम्मान दें। शिक्षकों को इतना सम्मान दें कि वे कोई भी गलत कार्य करने से पहले विचार करने को विवश हो जाएं कि वे एक शिक्षक हैं। शिक्षक को पदाधिकारियों का डर नहीं पर्याप्त सहयोग मिलना चाहिए, तभी शिक्षकों के द्वारा शिक्षा व्यवस्था में सुधार किया जा सकेगा। शिक्षकों को अपने विद्यालय के विकास के लिए पर्याप्त स्वतंत्रता और सहयोग मिलनी चाहिए। शिक्षकों को केवल शिक्षण कार्य दिया जाय। आज शिक्षकों से अध्यापन के अतिरिक्त सभी गैर शैक्षणिक कार्य करवाये जा रहे हैं जिससे राष्ट्र की अवनति हो रही है।


समाज…

यह उत्तरकाशी (केलसु घाटी) के सरकारी स्कूल के एक शिक्षक आशीष डंगवाल हैं.. जिनके स्थानांतरण पर आयोजित विदाई समारोह में स्कूल के बच्चों के साथ माता-पिता भी लिपट कर रोए.


आज समाज में ये विचार व्याप्त हो गया है कि सरकारी शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं तथा सरकारी स्कूलों में बहुत रूपया आता है। बहुत कम हीं लोग हैं जो स्कूल जाकर वहाँ की समस्या जानना चाहते हैं और समाधान का प्रयास करते हैं। अधिकांश की नजर रोकड़ पंजी हीं तलाशती है । ध्यान रखें कि ” शिक्षक साधारण कर्मचारी नहीं , राष्ट्रनिर्माता होते हैं ।” शिक्षण कार्य सबसे कठिन कार्य होता है इसलिए विकसित देशों में शिक्षकों को सबसे अधिक सम्मान और वेतन दिया जाता है। हमारे देश भारत में राजा भी रथ से उतरकर, अपना मुकुट उतारकर, पैदल चलकर गुरू से मिलने जाते थे। समाज को शिक्षकों के प्रति अपना नजरिया बदलना हीं होगा तभी राष्ट्र की उन्नति होगा।


आधुनिक अनुशासन पद्धति …


बालकेन्द्रित शिक्षा के अनुसार बच्चों को न तो डाँटना है और न हीं मारना है और बच्चों को पूर्ण स्वतंत्रता देनी है। किन्तु आज के सफल व्यक्तियों में से शायद कोई नहीं होगा जिसने कभी भी अपने किसी भी शिक्षक से मार न खाई होगी। आज के बच्चों में नैतिकता का अभाव देखा जा रहा है और बाल अपराधियों की संख्या बढ़ते जा रही है। ऐसे में बच्चों को सही राह दिखाने के लिए विशेष परिस्थिति में शिक्षकों को थोड़ी कड़ाई की छूट मिलनी चाहिए। बापु, गुरुदेव आदि भारतीय दार्शनिकों के स्वअनुशासन पद्धति को अपनाने की आवश्यकता है।


अभिभावक …..

यह उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूल के शिक्षक अवनीश यादव है ,जिन्हें पूरा गांव इनकी कार्य पद्धति की वजह से इन्हें बेटे की तरह मानता था.. इनके ट्रांसफर पर विदाई समारोह में पूरा गांव भावुक हो गया और बच्चे सिसक सिसक कर रोने लगे.. पूरे गांव ने कहा शिक्षक हो तो है ऐसा ..इन्होंने अपने कार्यकाल में कान्वेंट स्कूल को भी फेल कर दिया


सरकारी विद्यालय में मुफ्त में शिक्षा मिलती है और मुफ्त की चीजों की कदर नहीं होती है। देखा गया है जिस बच्चे का सरकारी स्कूल में शर्ट का बटन टूटा होता था उसी बच्चे को चमचमाते जूतों के साथ टाई लगाकर उसके माँ-बाप प्राइवेट स्कूल तक पहुँचाने जाते हैं ,यदि कोई सरकारी शिक्षक कभी बच्चों को थप्पड़ मार दे तो बेचारे की नौकरी पर दाँव लग जाती है। अभिभावक स्वयं का दायित्व भी शिक्षक पर लाद देते हैं जबकि बच्चों के समग्र विकास के लिए दोनो समान रूप से उत्तरदायी हैं। शिक्षक और अभिभावक एक दूसरे के सहयोगी न बनकर विरोधी बनते जा रहे हैं।अभिभावक बच्चों को मोबाइल और मोटरसाइकिल देकर उनके भविष्य के साथ खेल रहे हैं।


सिनेमा,इंटरनेट तथा मीडिया…


आज के सिनेमा के बारे में क्या कहना ? इसमें वासना की प्रबलता होती है जो युवा पीढ़ी को भटका रही है। बच्चे सोशल मीडिया और इंटरनेट का उचित प्रयोग नहीं कर उसके जाल में भटक कर रह जा रहे हैं। बच्चों का बचपन छिनता जा रहा है और उनमें मूल्यों का ह्रास दिख रहा है। बच्चे न तो अपने माता-पिता का सम्मान कर रहे हैं और न हीं अपने शिक्षकों का। बच्चों को इंटरनेट के मायाजाल से बचाकर उनकी मौलिकता और सृजनात्मकता को बचाये रखने की आवश्यकता है। बच्चों का स्वाभाविक विकास अभिभावकों के सहयोग के बिना बहुत ही कठिन है।


पाश्चात्य संस्कृति की अंधी नकल …


आज हमलोग पाश्चात्य संस्कृति की नकल करने में अपनी संस्कृति का नाश करने पर आमादा हैं। भारत का विकास भारतीय संस्कृति के विकास से हीं संभव है । हमें अपनी संस्कृति का पुनरुत्थान करने के साथ-साथ अपने मूल्यों को भी बचाना होगा। यह आसान तो नहीं है पर सम्मिलित प्रयास से ऐसा किया जा सकता है। हमें विज्ञान के साथ-साथ आध्यात्म के क्षेत्र में भी आगे बढ़ना होगा।
इसके अतिरिक्त और भी कई कारण हो सकते हैं पर कारण जो भी हो निवारण आवश्यक है.

यह तस्वीर गुरु शिष्य के प्रगाढ़ प्रेम के जीवंत छन है. तस्वीर तमिलनाडु के वेलिएगाराम गाँव के सरकारी स्कूल के अंग्रेजी प्राध्यापक और उनके स्कूल के बच्चों की है. स्थानांतरण के बाद स्कूल में उनका अंतिम दिन है बच्चे उन्हें जाने नहीं दे रहे ..यह तस्वीर आज की उम्मीद है

” जिस राष्ट्र में शिक्षकों का सम्मान नहीं होगा, उसका पतन निश्चित है ।”
इस समस्या का सरल समाधान है कि सभी (शिक्षक,अभिभावक,समाजसेवी,शिक्षा प्रेमी,सरकार के प्रतिनिधि आदि) अपने-अपने हिस्से के उत्तरदायित्वों का इमानदारीपूर्वक निर्वहन करें। यदि ऐसा संभव हुआ तो निश्चित रूप से विश्व के मानचित्र में हमारी एक अलग पहचान होगी. शिक्षकों को स्मरण रखना होगा केवल शिक्षकों में ही राष्ट्र को शिखर पर ले जाने का सामर्थ्य है। स्वार्थ से परे , स्वयं की शक्ति को पहचानते हुए बच्चों के साथ-साथ राष्ट्र का भविष्य गढ़ने में अहम भूमिका निभानी होगी।

  • लेखनी@ डॉ.नितेश कुमार
    सहायक शिक्षक
    रा.सं.+2 उच्च विद्यालय, सिमरिया
  • (यह लेखक के व्यक्तिगत अनुभव और विचार हैं ।)

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