लेख: डाॅ हर्षवर्द्धन कुमार
शिक्षा विशेषज्ञ एवं निदेशक, बेनी एजुकेशनल साॅल्यूसन्स एण्ड टेकनाॅलजीज फाऊण्डेशन, नई दिल्ली।
(पिछले बारह वर्षोें से शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत तथा सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं के साथ काम करने का अनुभव। शिक्षक शिक्षा से लेकर प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा के क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण कार्यों में योगदान। बाल कविताएँ कई प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित)
लगभग हर दिन दिल्ली मेट्रो में सफर के दौरान यह उद्घोषणा सुनायी देती है कि ‘बच्चों का हाथ पकड़कर रखें’। मेट्रो के यात्रियों के लिए अपने बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए यह घोषणा बार-बार की जाती है। यह कहा जा सकता है कि यदि अभिभावकों को भी अगर बच्चों की सुरक्षा के प्रति यूँ बार-बार ध्यान दिलाना पड़े तो यह निश्चय ही सोचनीय विषय है। आज परिस्थितियाँ कुछ ऐसी हीं हैं कि हर माता-पिता/अभिभावक को बच्चों की सुरक्षा, उनकी भलाई के लिए सचेत किया जाए। बच्चे के चारों ओर आज भी कई तरह के खतरे मौजूद हैं जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। ऐसा ही एक खतरा इन्टरनेट के उपयोग से भी जुड़ा है।

घटित घटनाएं शर्मनाक है चिंता बढ़ाने वाली है …


अखबारों में महिलाओं के विरूद्ध अपराधों की खबरों का सिलसिला न केवल निरंतर जारी है बल्कि यह लगातार बढता भी जा रहा है। यह किसी भी समाज के लिए शर्मनाक है। लेकिन इस दिशा में बदलाव नहीं नजर आ रहा ..और तो और अब छोटे बच्चे-बच्चियों के प्रति बढ़ रहे यौन अपराधों ने हमें चिन्तित होने का एक और कारण दे दिया है। पिछले कुछ दिनों में अलग-अलग अखबारों में बच्चों से संबंधित दो खबरें बेहद निराश करने वाली थीं। एक खबर के अनुसार कानपुर के एक गाँव में छह से दस साल के चार बच्चों ने मोबाइल पर पोर्न वीडियो देखकर एक चार साल की बच्ची के साथ गैंग रेप किया। वहीं दूसरी खबर में दिल्ली में एक आठ साल की एक लड़की से उसके नाबालिग बडे़ भाई ने ही बलात्कार किया। ये दोनों घटनाएं बेहद निराशाजनक हैं। हाल के वर्षों में वयस्कों द्वारा बच्चों के यौन शोषण की बढ़ती घटनाओं से पूरे देश में क्षोभ का माहौल पहले ही बना हुआ है। माता-पिता अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर बेहद चिन्तित हैं। वे अपने बच्चों के आसपास किसी को भी देखकर सशंकित हो जा रहे हैं। यह स्वाभाविक प्रतिक्रिया भी है और बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से जरूरी भी। माता-पिता बच्चों को घर पर बैठकर टीवी, कम्प्यूटर अथवा मोबाइल के साथ व्यस्त देखकर सुरक्षित महसूस करते हैं। लेकिन क्या यह सुरक्षा का एहसास टिकाऊ हो सकता है? जवाब सकारात्मक तो बिल्कुल नहीं हो सकता।

पोर्न वीडियो का बच्चों तक पहुंचना सबसे घातक हो सकता है..


वर्तमान परिदृश्य में इन्टरनेट और सोशल मीडिया वे अनियंत्रित शक्तियाँ हैं जिनकी पहुँच और हमारे जीवन पर दखल में लगातार वृद्धि हो रही है। टीवी पर दिखाये जाने वाले कार्यक्रमों में तो अश्लीलता बढ़ी ही है लेकिन असली खतरा इन्टरनेट और सोशल मीडिया से है। पिछले कुछ समय से इस विषय पर एक शोधपत्र तैयार करने के लिए मैंने इन्टरनेट और सोशल मीडिया पर पोर्न तथा अश्लीलता की उपलब्धता एवं उनके बच्चों तथा किशोरों तक पहुँच की संभावनाओं की पड़ताल की है। इस संबंध में कई स्कूलों के शिक्षकों तथा अभिभावकों से भी बातचीत की है और यह पाया है कि पोर्न तथा संबंधित सामग्री की उपलब्धता तथा उपयोग पर कोई वास्तविक नियंत्रण नहीं है। यदि बच्चे इन्टरनेट और सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं तो संभव है किसी न किसी तरह ऐसी सामग्री उनतक पहुँच सकती है जो उनके मन मस्तिष्क पर गलत प्रभाव डाल सकती हैं और ऐसी सामग्रियों में से पोर्न वीडियोज् का हमारे बच्चों तक पहुँचना सबसे अधिक घातक हो सकता है। इसका प्रमाण है इस लेख के प्रारंभ में उल्लेखित घटनाएं। ऐसी घटनाओं का सबसे दुःखद पहलू यह है कि इनमें अपराध का शिकार तथा अपराध करने वाले दोनों ही बच्चे हैं। वस्तुतः देखा जाए तो दोनों हीं इसमें पीड़ित हैं तथा ऐसी घटनाओं से दोनों ही अपने स्वस्थ तथा सुरक्षित बचपन के अधिकार से वंचित हो जा रहे हैं।

सोशल मीडिया पर हर पल खतरे की संभावना बनी हुई है..


देखा जाए तो बच्चों तक ऐसी सामग्री के पहुँचने के भी कई तरीके हैं या तो वे जिज्ञासावश खुद ही छानबीन कर रहे हैं अथवा उन्हें वयस्कों अथवा अन्य बच्चों द्वारा ऐसी सामग्री उपलब्ध करायी जा रही है और यहाँ तक की कई बार सोशल मीडिया पर अनजाने में ही उनका सामना ऐसी सामग्री से हो जा रहा है। यह कहीं अधिक असुरक्षित है। अपनी पड़ताल के दौरान मैंने यह पाया कि लगभग हर सोशल मीडिया पर यह खतरा मौजूद है। आप फेसबुक पर सामान्य रूप से किसी मित्र, परिचित अथवा सामग्री को सर्च कर रहे हों तो सुझावों में कुछ अश्लील पृष्ठ व सामग्री भी प्रदर्शित होती है। यदि आप इन्स्टाग्राम पर लाइव वीडियोज देख रहे हों तब भी ऐसा हो सकता है। कई लाइव फीड बच्चों के लिए अनुपयुक्त हैं। गुगल की तो बात ही निराली है। उसपर हर सूचना मौजूद है। यू ट्यूब भी ऐसे खतरों का अपवाद नहीं है। आप कह सकते हैं कि फेसबुक जैसे माध्यमों पर बच्चों के लिए एकाउंट नहीं होता परन्तु आप भी यह जानते हैं कि यदि आपके पास कोई फोन नम्बर अथवा ई-मेल पता है तो किसी भी सोशल मीडिया पर एकाउंट बनाना बहुत आसान है और वर्तमान पीढ़ी संचार माध्यमों के उपयोग में कहीं अधिक सहज एवं निपुण हैं।

दुविधा इसी परिवेश में रहना भी और बच्चों को बचाना भी


अब सवाल यह है कि खतरा है तो बचाव अथवा सावधानियाँ भी होंगी। प्रश्न यह भी महत्त्वपूर्ण है कि जब ऐसी आवंछित सामग्री की हमारे बच्चों तक पहुँचने की पूरी-पूरी संभावना है तब माता पिता तथा अभिभावक क्या करें? आखिर किस-किस माध्यम पर और कितनी की जानी संभव है? आप बच्चों को पूरी दुनिया से अलग-थलग भी तो नहीं कर सकते। दुविधाएँ बहुत सारी हैं और चिन्ताएँ अन्तहीन।

ऐसे में माता-पिता तथा अभिभावकों के लिए कुछ सुझाव हैं जो खतरे को कम करने और बच्चों को सुरक्षित रखने में सहायक हो सकते हैं..

बच्चों से संवाद बनाए रखिये। उन्हें अच्छे बुरे की समझ दीजिए। उनकी आयु के अनुसार उन्हें तथ्यों से अवगत करायें। 
बच्चों की जिज्ञासा का सम्मान करें। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे जो भी जानना चाहें उन्हें जानने अथवा प्रयोग करने दें। बल्कि उनके प्रश्नों और जिज्ञासाओं को धैर्यपूर्वक सुनते हुए उन्हें सही तरीके से उनके लिए उपयुक्त बातें बतायें।
बच्चों का स्क्रीन टाइम निर्धारित करें। इसका अर्थ है कि बच्चे हर दिन कितनी देर टीवी, कम्प्यूटर, लैपटाॅप, फोन, टैबलेट आदि के साथ बितायें यह निर्धारित करें।
इन्टरनेट के निर्बाध उपयोग को बढ़ावा न दें। जहाँ तक संभव हो स्कूल के प्रोजेक्ट आदि के लिए इन्टरनेट के उपयोग के लिए मार्गदर्शन प्रदान करें। इन्टनेट तथा वाई-फाई को पासवर्ड से सुरक्षित रखें तथा यह बच्चों के साथ साझा न करें।
यदि किसी स्थिति में बच्चे को व्यक्तिगत रूप से उपयोग के लिए फोन दे रखा है तो उसमें अनलिमिटेड इन्टरनेट पैक न डलवायें।
आवंछित चैनलों, साइटों आदि को ब्लाॅक कर दें।
समय-समय पर इन्टरनेट की ब्राउजिंग हिस्ट्री की जाँच करें। कुछ आवंछित मिलने पर बच्चे से बात भी कर सकते हैं।
वयस्क बच्चों की उपस्थिति में क्या देख और सुन रहे हैं इसका ध्यान रखें।
संभव है कि आपके फोन पर सोशल मीडिया समूह में ऐसी सामग्री भी साझा की जा रही हो जो बच्चों के लिए उपयुक्त न हो अतः अपना फोन बच्चों की पहुँच से दूर तथा पासवर्ड द्वारा सुरक्षित रखें।
बच्चों के सामाजिक जीवन पर नजर रखें। किसी अपरिचित व्यक्ति अथवा स्कूल या घर में काम करनेवाले किसी वयस्क से बच्चे के अधिक घुलने-मिलने पर सतर्क हो जाएं।

..यह हम सभी जानते हैं कि वर्तमान समय में कानूनों के दायरे में तथा उनकी अनुपालना के आधार पर तो पोर्न वीडियोज् तथा अन्य अश्लील सामग्री का अस्तित्त्व तो नहीं मिटाया जा सकता परंतु इन्टरनेट और सोशल मीडिया के उपयोग के कारण ऐसी सामग्री बच्चों तक न पहुँचे इसके प्रयास किये जा सकते है। उपरोक्त सुझाव अश्लील सामग्री तक बच्चों की पहुँच को कम करने तथा उन्हें कहीं अधिक सुरक्षित रखने में सहायक हो सकते हैं।

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