प्रवासी मजदूरों ,छात्रों के घर वापसी पर सियासत और तुष्टिकरण व वोटबैंक नीति हावी , वादे बने वादे हैं वादों का क्या ? जमीन पर नही उतरता नजर आ रहा कोई भी पूर्व निर्धारित एजेंडा.
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आज करीब करीब सम्पूर्ण देश कोविद 19 वैश्विक कोरोना वायरस महामारी केजानलेवा से जूझ रहा है।मानवता अपने अस्तित्व के लिए इस जानलेवा महामारी से जंग लड़ रही है। इससे बचाव के लिए देश में सम्पूर्ण लॉक डाउन लगा हुआ है। इससे सर्वाधिक प्रभावित गरीब, असहाय,जरूरतमंद मजदूर और इनपर आश्रित इनके परिवार बने हुए हैं। देश के औधोगिक प्रांतों में लाखों प्रवासी मजदूर और तकनीकी शिक्षण व कोचिंग संस्थानों से जुड़े प्रांतों में हजारों छात्र फसे हुए है। सरकारी दावे के अनुसार सम्बंधित प्रान्तों में इन्हें सुरक्षित कवारेंटाइन में रखा गया है और पूरा ख्याल रखा जा रहा है। प्रवासी मजदूर व छात्र और इनके परिजनों को इनके अपने घर वापसी के लिए बेसब्री से इंतेजार है। लंबी प्रतीक्षा के पश्चात इनके घर वापसी सुनिश्चित करवाने का मुहिम प्रारम्भ कर दिया गया है ,किन्तु फिलहाल रफ्तार धीमी चल रही है।

प्रवासी मजदूरों के हालात की हकीकत और सरकार केंद्र हो या राज्य उनके इमान का तो पता सही समय पर चलेगा ही..

पूर्व निर्धारित एजेंडा के मोताबिक घर वापसी में होने वाले परिवहन खर्च का वहन 85 फीसद केंद्र और 15 फीसद राज्य सरकार द्वारा किया जाना तय हुआ है , किन्तु अभी तक घर लौटे प्रवासी मजदूरों की माने तो उनसे किराया वसूला गया। अपने पैसे से टिकट कटवाना पड़ा। इससे इन्हें भारी परेशानी व कष्ट उठाना पड़ा। जिनके पास पैसे थे उनका काम तो किसी तरह चल गया। जिनके पाकेट खाली थे उन्हें उधार व कर्ज लेकर टिकट कटवाने में भारी मशक्कत करना पड़ा। क्वारेन्टीन में भूखा सोना पड़ा ।पेट की आग बुझाने के लिए फेके गए जूठन भी खाने के लिए मजबूर होना पड़ा ।ऐसी परिस्थिति में वक्त और दुर्भाग्य के मारे इन लोगो पर क्या गुजरा होगा ? इसके इजहार के लिए शब्द छोटे पड़ जाएंगे ।इसका हकीकत का इजहार तो सही सही घर लौटे प्रवासी मजदूर और छात्र ही कर सकते हैं व केंद्र व राज्य सरकार का इमान।

प्रवासी मजदूरों की सियासत पर कोई दल अछूता नहीं , पक्ष या विपक्ष वोट की राजनीति को लेकर शतरंजी चाल किसी की छुपी नहीं , बस प्रवासी मजदूरों का दर्द दर्द ही रहा..

प्रवासी मजदूरों व छात्रों के घर वापसी में केंद्र व राज्य सरकारों को जो भी पापड़ बेलने पड़े हों यह बात इत्तर हैं ,किन्तु इसपर सत्ता व विपक्षी दलों के बीच सियासती घमासान,पलटवार पर पलटवार ,तुष्टिकरण और वोट की राजनीति को लेकर शतरंजी चाल छुपी नही रह पाई । कोई दल इसमे पीछे नही रहा।वादों की बौछार होती रही ,किन्तु वादे वादे हैं वादों का क्या की लोकोक्ति को चरितार्थ किये व कर रहे हैं। इस आपातकाल व महाभीषण संकट व झंझावात में भी देश व लोकहित की चिंता छोड़ राजनीतिक दल एक दूसरे से बढ़कर जनता का विश्वास ,भरोसा,समर्थन बटोरने के धींगामस्ती व कूटनीतिक प्रयास में जुटी रही व अभी भी यह कूटनीतिक प्रयास जोर ही पकड़ती जा रही है। राजनीतिक दल वादा फरमाने में एक दूसरे से पीछे नही रह रहे हैं। इनके बीच प्रवासी मजदूर और छात्रों के घर वापसी को लेकर सियासी जंग छिड़ा हुआ है। विपक्षी दलें प्रवासी मजदूरों छात्रों के घर वापसी में केंद्र सरकार द्वारा भेदभाव बरतने का आरोप लगा रही है ।भूखे प्यासे व जैसे तैसे घर लौट रहे प्रवासी मजदूरों व छात्रों से सरचार्ज के साथ किराया वसूलने और रेलवे को देने का आरोप लगाया जा रहा है।उभरती तस्वीरें कुछ ऐसा ही बयां भी कर रही हैं ।

कांग्रेस के धुर विरोधी पार्टियों ने खासकर भाजपा ने इस पर खूब बवाल मचाया 85 और 15 प्रतिशत रेलवे खर्च के मायने समझाएं ,जब कांग्रेस पार्टी की आला कमान सोनिया गांधी का फरमान आया पार्टी मजदूरों का खर्चा उठाएगी, सियासी बवाल मच गया , राजनीतिक रोटियां सेकने के आरोप लगे..

कॉंग्रेस पार्टी की तरफ से एक पत्र जारी होता है जिसमें प्रवासी मजदूरों को उनके घर वापसी का बीड़ा कॉंग्रेस पार्टी अपने स्तर से उठाएगी ऐसा जिक्र होता है। श्रोमति गांधी ने राज्य कमिटियों को अपने अपने राज्यों के प्रवासी मजदूरों को वैधानिक प्रक्रिया पूरा कराते हुए पार्टी के खर्च पर घर वापसी सुनिश्चित करवाने का निर्देश दिया। राज्य कमिटियों द्वारा इसकी प्रक्रिया प्रारंभ कर देने की बात भी सामने आ रही है।कई राज्यो की मुख्य व जनाधार वाली व सत्ता के दौर में शामिल क्षेत्रीय पार्टियों ने भी अपने अपने राज्यों के प्रवासी मजदूरों छात्रों की घर वापसी अपने खर्च पर सुनिश्चित -करवाने की घोषणा की है।

क्या लॉक डाउन 3 में प्रवासी मजदूर घर पहुंच पाएंगे?

फिलवक्त घोषणा के मोताबिक लॉक डाउन – 3 , 17 मई तक लागू रहेगा , समाप्त हो जाएगा व और आगे बढ़ेगा इसे अभी बताना जल्दीबाजी होगी ,चुकि यह देश व राज्यों में कोरोना वायरस संक्रमण के भौतिक स्थिति पर ही निर्भर करेगा । घर वापसी के लिए बेसब्री से प्रतीक्षारत लाखो प्रवासी मजदूर हजारो छात्र कुछ दिन पूर्व ही शुरू हुआ घर वापसी की प्रक्रिया में लॉक डाउन 3 की अवधि तक क्या घर पहुच पाएंगे ।इसपर भी सवालिया निशान लगना व लगाया जाना लाजमी माना जा रहा है ।

स्थिति जो भी हो इस भीषण संकट व झंझावात में भी सियासत ,कूटनीति ,तुष्टिकरण व वोट बैंक की राजनीति के तहत कोई भी शतरंजी चाल किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए सबसे बड़ी त्रासदी ,बिडम्बना व दुर्भाग नही तो इसे और क्या संज्ञा दी जा सकती है

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