चतरा की धरती शूरवीरों की धरती रही है, स्वर्णिम रहा है स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास. खनिज संपदा से भरपूर प्रकृति की गोद में बसा चतरा आज बेबस और लाचार है.. अवैध तस्करी का शिकार, उग्रवाद का प्रभाव.. आम जनों की अमन चैन पर आए दिन नजर लगती रहती है. कहीं खनिज संपदा की प्रचुरता या प्रकृति की खास नीआयत तो नहीं बन रही है अभिशाप? क्या हुआ है चतरा को …

चतरा/ झारखंड: स्वतंत्रता संग्राम की लड़ी गई लड़ाईयों में सन 1857 का स्वतन्त्रता संग्राम विशेष महत्त्व रखता है ।

1857….

स्वाधीनता आंदोलन के दस्तावेजों एवं इतिहासकारों के मुताबिक 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का पहला और निर्णायक युद्ध चतरा की धरती पर 02 अक्टूबर ,1857 को लड़ा गया था । जिसमें विद्रोही शूरवीरों ने ब्रिटिश हुकूमत को हिला कर रख दिया था । करीब एक घंटे तक चली इस भीषण लड़ाई में 56 यूरोपियन सैनिक और कई अधिकारी मारे गए थे । वही 150 क्रांतिवीरों ने स्वाधीनता की बलिवेदी पर हंसते हंसते अपना प्राण यौछावर कर दिया था ।77 हुतात्माओं को एक ही गड्ढे में दफन कर दिया गया था ।अनेक शूरवीरों को पेड़ों पर लटका कर फांसी के फंदे में झूला दिया गया था ।इस युद्ध में हुई जान-माल की भारी क्षति से ब्रिटिश हुकूमत इस कदर बौखला गई थी कि युद्ध नियमों का उल्लंघन करते हुए ब्रिटिश साम्राज्य के छोटानागपुर कमिश्नर सिंपसन ने 4अक्टूबर , 1857 को आनन फानन में गदर की धारा 17 के तहत क्रांति वीरों का नेतृत्व किये सूबेदार मंगल पांडेय और सूबेदार नादिर अली खां को घायलावस्था में ही चतरा फंसिहरी तालाब पर स्थित एक पेड़ से लटका कर फांसी के फंदे से झूला दिया था ।इसे लेकर न्यायिक विचार मैं ब्रिटिश हुकूमत की काफी किरकिरी भी हुई थी ।इस तरह चतरा का इस स्वतंत्रता संग्राम में अविस्मरनीय योगदान होने के साथ साथ 1857 की क्रांति में पुरे छोटानागपुर में स्वाधीनता के बलिबेदी पर शूरवीरों के हसते हसते फाँसी से झूल जाने का सबसे पहला फांसी स्थल बनने का गौरव प्राप्त है ।चतरा का फांसीहारी तालाब और युद्ध मे मारे गए ब्रिटिश हुक्मरानों लेफ्टिनेंट जेसीसी डांट और मेजर सार्जेंट डायनन का चतरा कैथोलिक आश्रम स्थित कब्रगाह आज भी इसका मूक गवाह है।

चतरा का गौरवशाली इतिहास.. पौराणिक समृद्ध विश्व विख्यात धर्मस्थली.. कौलेश्वरी पहाड़… भद्रकाली मंदिर...

चतरा का गौरवशाली इतिहास रहा है । प्रकृति ने भी चतरा को भरपूर प्राकृतिक और खनिज संपदा से नवाजा है । विश्वस्तरीय ख्याति व पहचान के तीर्थ सह पर्यटनस्थल और सनातन ,बौद्ध और जैन धर्मों का समन्वयक स्थल हंटरगंज का कौलेश्वरी पहाड़ और इटखोरी का भद्रकाली मंदिर का धार्मिक महत्व चतरा के अस्तित्व और विविधता में चार चांद लगता है ।

भद्रकाली मंदिर (फोटो सोशल मीडिया)

उग्रवाद.. माओवाद के जन्म से चतरा के अमन-चैन पर ग्रहण लग गई.. तस्करी, लेवी, दहशतगर्दी का खेल अपने चरम पर पहुंचा...


चतरा का भौगोलिक पृष्ठभूमि व संरचना जंगल झाड़ी ,पहाड़ और नदी नालों से आच्छादित है ।इसकी उत्तरी चौहद्दी बिहार राज्य का सीमावर्ती है ।आजादी प्राप्ति के करीब तीन दशक भी नही बीते और इसपर जनवाद के नाम पर गठित भाकपा माओवादी संगठन का ग्रहण लग गया और इसी के साथ इसके बुरे दिन भी प्रारम्भ हो गए। संगठन ने सबसे पहले अपना पांव चतरा के दुरूह जंगल क्षेत्र कुंदा में रखा था। संगठन ने अहिस्ता आहिस्ता चतरा के प्रायः ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी मजबूत पैठ जमा लिया और आतंक का माहौल कायम कर दिया । कालांतर में समानांतर सरकार चलाने लगा। जनता की नजर में प्रशासन और पुलिस की कद को छोटा दिखाने व बनाने और अपना स्वयम्भू वर्चस्व लिए जनअदालत लगाकर छोटे बड़े मामलों का फैसला सुनाने लगा । गुनहगारों को सजा भी मुकर्रर करने लगा । माओवादियों ने हंटरगंज के कौलेश्वरी एरिया को अपना जोन ही नहो रेड कॉरिडोर (लाल गलियारा ) बना लिया ।इस रास्ते से हथियारों के खेप का आदान प्रदान बाहरी क्षेत्र के माओवादियों के साथ होने लगा ।यह आने जाने का महफूज व सुरक्षित मार्ग भी बन गया ।साथ ही स्थायी ठहराव आपसी राय विचार ,सामरिक रणनीति निर्धारण ,व्यूह रचना और सैन्य संचालन का अभेद दुर्ग भी।।संगठन ने भय फैलाने व दहशतगर्दी के लिए चाहे अनचाहे दर्जनो हत्याओं को अंजाम दिया ।चतरा पर करीब तीन दशकों तक माओवादियों का वर्चस्व व दबदबा कायम रहा ।इस दौरान विकास का करोड़ो करोड़ रुपये माओवादी लेवी की भेंट चढ़ता रहा । विकास कार्य की गुणवत्ता ,पारदर्शिता बुरी तरह प्रभावित होती रही, वही माओवादी आर्थिक और सामरिक सुदृढ़ता की लगातार सीढियां चढ़ते रहे ।कलांतर में विचारधारा को लेकर संगठन में फूट पड़ गयी और संगठन से फूटे उग्रवादियों ने टीपीसी नाम का नया उग्रवादी संगठन खड़ा कर दिया । सरकार ,पुलिस के लगातार बढ़ते भारी दबिश और टीएसपीसी उग्रवादी के धुर विरोधी प्रतिद्वंदिता , घात प्रतिघात के कारण भाकपा माओवादी लगातार कमजोर पड़ने लगी और लगातार क्षति पर क्षति पहुचने लगी ,इससे लाचार , असमर्थ,होकर भाकपा माओवादी संगठन गुमनामी में बने रहने के लिए मजबूर हो गया और क्षेत्र से करीब करीब पलायन कर गया ।हिट एंड रन की रणनीति अपनाये रहे । इसका बेजा फायदा इसका प्रतिद्वंदी टीएसपीसी उग्रवादी संगठन उठाने लगा ।धीरे धीरे माओवादी नक्शे कदम पर चलने लगा।लेवी के लिए माओवादियों की तरह ही सारी हदें लांघने लगा।पुलिस के लिए चनौती पर चुनौती खड़ा करने लगे ।

पुलिस के लगातार बढ़ते भारी दबाव पर दबाव के कारण टीएसपीसी उग्रवादियों ने भी इधर कई वर्षों से निष्क्रियता ,गुमनामी की चादर ओढ़ रखी है। चतरा की ऐतिहासिक धरती को लंबे अर्से बाद इस बुरी बला से निजात मिला।क्षेत्रवासी भी राहत की सांस लेने लगे थे, किंतु तस्करों को यह रास नही आया और चतरा की धरती को अपनी तस्करी व गैरकानूनी धंधों का चारागाह बना लिया ….

तस्करी परवान पर.. चरस,अफीम,शराब,कथा आदि गैरकानूनी धंधों का हब…

आज चतरा की ऐतिहासिल धरती एक बार फिर बड़ी विडंबना से जूझ रही है । अफीम ,चरस शराब ,कत्था और महुआ ,वन संपदा लकड़ी ,पत्थर आदि गैरकानूनी धंधों का हब बना हुआ है । बिहार में शराबबंदी के बाद देशी विदेशी शराब की तस्करी परवान चढ़ा हुआ है । मुख्य रूप से बिहार के सीमावर्ती इलाके हंटरगंज ,जोरी कुंदा प्रतापप्पुर ,प्रखंड के दर्जनों वनक्षेत्र के हजारों एकड़ वनभूमि पर अफीम हेतु पोस्ते की खेती प्रत्येक वर्ष लहलहाती है। बिहार राज्य के सीमा से सटे इलाकों में अवैध महुआ शराब निर्माण की सैकड़ो छोटी बड़ी भट्ठियां रोज सुलगती है ।रोज हजारो लीटर अवैध महुआ शराब की खपत प्रतिबंधित बिहार क्षेत्र में हो रहा है ।बड़े पैमाने पर अंग्रेजी व नकली अंग्रेजी शराब का भी खेप बिहार क्षेत में भेजा जा रहा है ।रोज सैकड़ो क्विंटल महुआ फल अवैध रूप से सीमावर्ती प्रतिबंधित बिहार राज्य में भेजा जा रहा है ।करोड़ो रुपये मूल्य का अफीम , अफीम ,चरस की तस्करी चतरा से अन्तरप्रांतो में हो रही है ।इस काले धंधे का संचालन स्थानीय और अंतरप्रांतीय तस्करों के नेरवर्क में चल रहा है ।इन काले धंधों से क्षेत्रीय शांति सुरक्षा और सामाजिक समरसता बुरी तरह प्रभावित हो रहा है ।क्षेत्र का अपराधीकरण का ग्राफ भी लगातार उच्चाई पकड़ रहा है ।बाहरी अपराधियों की क्षेत्र में गतिशीलता ,सक्रियता लगातार बढ़ते कर्म में है।युवाओं में नशे की चसक बढ़ रही है ।क्षेत्र में भय , असुरक्षा , अशांति का माहौल बना रहता है ।क्षेत्रवासी इसे उग्रवाद से भी बुरी बला की संज्ञा दे रहे है ।भय व आशंका जता रहे है कि समय रहते इसपर अंकुश नही लगा तो चतरा को जाफना व अपराधियो और तस्करी का अभेद गढ़ बनने से रोक पाना टेढ़ी खीर बन जायेगा

पुलिस प्रशासन की सक्रियता, सख्ती,छापेमारी अभियान के बावजूद भी...

ऐसी नही है की पुलिस हाथ पर हाथ धरे तमाशबीन बनी हुई है। सघन छापामारी अभियान चला रही है ।एसपी चतरा अखिलेश बी वारियर खुद सघन छापामारी अभियान का सघन मोनेटरिंग व नेतृत्व कर रहे हैं। डीआईजी पंकज कम्बोज भी समय समय पर स्थिति की समीक्षा कर रहे है ।पुलिस कर्मियों को ताकित व हिदायत भी कर रहे हैं । पुलिस तस्करों को लगातार भारी आर्थिक चोट पर चोट पहुचा रही हैं ,किन्तु बड़ी बिडम्बना है कि पुलिस का हाथ शायद ही तस्कर की गर्दन तक पहुच पा रहा है ।नतीजा है कि केवल आर्थिक चोट का कोई खास असर तस्करों के सेहत पर पड़ता नहो दिख रहा है। कानूनी गिरफ्त से मुक्त बने रहने के कारण तस्करों का हौसला मनोबल सातवें आसमान पर बना हुआ है और उपरोक्त गैरकानूनी धंधा निर्वाध रूप से चालू है और फलफूल रहा है ।

सारे गैरकानूनी धंधा, तस्करी का खेल.. इतना आसान नहीं है.. सारा खेल संरक्षण का है; भ्रष्ट तंत्र का है! जब तक यहां सरकार की, स्थानीय प्रशासन की दबिश नहीं होगी यह खेल और बड़ा होता जाएगा और खिलाड़ी भी

बड़ी त्रासदी है कि धंधेबाजों को कथित भ्र्ष्ट कर्मियों और क्षेत्र के दबंग व रसुकधारी सफेदपोशों का संरक्षण मिल रहा है ,अपने ही हाथ लंका जला रहा है ,जो अभियान के वांछित ,अपेक्षित सफलता में बड़ा रोड़ा बना हुआ है ।क्षेत्रवासियों का दावा है कि जब तक इन रोड़ों को रास्ते से नही हटाया जाएगा ,तबतक तस्कर कानून के हत्थे नही चढ़ेंगे और ये गैरकानूनी धंधे भी बदस्तूर चलते रहेंगे,जो चतरा के लिए एक दिन बड़ा नासूर बन जायेगा ।जिसे समाप्त करना पुलिस के लिए मुश्किल ही नही नामुमकिन बन जायेगा ।बड़ी त्रासदी है कि इधर कुछ समय से गुमनानी में बने माओवादी चतरा क्षेत्र में दोबारा फन काढ़ने लगे है ।विध्वंसकारी घटनाओं को अंजाम देने लगे है ।तस्करों को संरक्षण दे रहे हैं और बदले में मोटी लेवी वसूल रहे हैं ।अपने को सामरिक रूप से सुदृढ़ करने में जुटे हुए हैं ,जो चतरा के लिए बड़ा अशुभ प्रभाव व संकेत माना जा रहा है।

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