देखते देखते क्या से क्या हो गया और कहां पहुंच गया कला का मंदिर भारतीय सिनेमा जगत ? अतीत में प्रतिभा हुनर व कला का राज वर्तमान में आतंकियों का साम्राज्य ,अतीत में राष्ट्रीयता का पक्षधर समर्थक वर्तमान में देशद्रोहियों से सांठगांठ , यक्ष प्रश्न बना कब लगेगा इन आतंकियों पर लगाम और कब तक सोया रहेगा हिंदुस्तान व हिंदुस्तानी , जानिए भारतीय सिनेमा जगत के अतीत की खूबियां और वर्तमान का बदतर हालात

कला का मंदिर भारतीय सिनेमा जगत का अति गौरवशाली और स्वर्णिम था अतीत का इतिहास

अश्लीलता भाई भतीजावाद लिंग भेद ड्रग्स एडिक्ट आदि अन्य सभी अपसंस्कृतियों से अछूता था भारतीय सिनेमा जगत का अतीत

भारतीय सिनेमा जगत का अतीत से पूरा बदल गया बॉलीवुड का वर्तमान इतिहास

धूमिल हो रही भारतीय शालीनता सौम्यता और सारगर्भिता , हदें लांघ रही पश्चिमी अश्लीलता कामुकता रस्मो रिवाज

डरवर्ल्ड ड्रग माफिया व देशद्रोही अराजक तत्व के सांठगांठ से लहूलुहान हो रही राष्ट्रीयता

काफी गौरवशाली और स्वर्णिम रहा भारतीय सिनेमा जगत के अतीत का इतिहास

भारतीय चलचित्र का इतिहास आजादी से पूर्व का है. यह एक कुश्ती मैच की सरल रिकॉर्डिंग थी जिसे सन 1899 में प्रदर्शित किया गया था और भारतीय फिल्म उद्योग में यह पहला चलचित्र माना जाता है बॉलीवुड की नीव भारतीय सिनेमा के पिता दादासाहेब फालके ने फुल लेंथ की ब्लैक एंड वाइट मूक फिल्म राजा हरिश्चंद्र फिल्माकर रखी थी जो 1913 में प्रदर्शित हुई थी. यह फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई और आज भी भारतीय फिल्म जगत के उत्कृष्ट राष्ट्रीय फिल्मों में शुमार है . इस फिल्म के निर्माता-निर्देशक व पटकथा लेखक खुद
दादा साहेब फाल्के थे. नायक और नायिका दत्तात्रेय दामोदर दबके और अन्ना दबके थी , चुकी सभी कलाकार मराठी थे इसलिए इस फिल्म को मराठी श्रेणी में रखा जाता है .

1907 में प्रथम फिल्मालय एलिफिंस्टन पिक्चर पैलेस कलकत्ता की हुई स्थापना

जे एफ पठान ने सन 1907 ने प्रथम सिनेमा घर एलिफिंस्टन पिक्चर पैलेस कलकत्ता का निर्माण किया. प्रथम बोलती ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म आलम आरा का निर्माण और प्रसारण सन 1931 में हुआ था. यह फिल्म भी भारतीय सिनेमा इतिहास की एक खास फिल्म थी जिसके डायरेक्टर अर्देशीर इरानी और नायक नायिका क्रमशः मास्टर विट्ठल और जुवैद मुख्य भूमिका में थे. यह भी एक यादगार फिल्म थी और भारतीय इतिहास पर आधारित थी .

40 से 60 के दशक के बीच में भारतीय सिनेमा ने काफी तरक्की और सुर्खियां बटोरी

भारतीय सिनेमा ने 40 से 60 दशक के बीच काफी तरक्की की और सुर्खियां भी बटोरी ,ये वो चेहरे हैं जिन्होंने भारतीय सिनेमा को एक नया अध्याय दिया अभिनेता कुंदन लाल सहगल और अदाकारा जमुना बरुआ की फिल्म देवदास की भी काफी तारीफ हुई , जिसका प्रसारण 30 मार्च 1935 को हुआ था सन 1957 में भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता रहे गुरु दत्त की फिल्म प्यासा भारतीय सिनेमा की सबसे सफल फिल्मों में एक थी. फिल्म में मशहूर अदाकारा वहीदा रहमान थी इसका प्रसारण 1957 मे हुआ था. भारतीय सिनेमा की ये फिल्में सिनेमा जगत पर गहरी छाप छोड़ने में कामयाब रही हैं ,ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों से आगाज हुआ भारतीय फिल्म भले ही आज रंगीन हो गया हो लेकिन इस दौरान ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों का योगदान बहुमूल्य है .

असीम खूबियों से भरा था भारतीय सिनेमा का अतीत

यह सुस्पष्ट और प्रमाणिक है कि भारतीय सिनेमा का अतीत का इतिहास काफी स्वर्णिम और गौरवशाली रहा. यह विशुद्ध रूप से कला और ज्ञान का मंदिर बना रहा अराजक तत्वों से बिल्कुल अछूता बना रहा ,कला फन वह हुनर की प्रधानता रही भारतीय सभ्यता संस्कृति धर्म और ऐतिहासिक प्रसंगों का हिमायती बना रहा. रसूखदारो की पहुंच से बाहर बना रहा कला और हुनर की पूजा होती रही , चरित्र को प्रधानता जाती रही ,अश्लीलता भोंडापन व नकलीपन दिखावा पर कड़ी पाबंदी लगी रही ,माता -पिता, पुत्र पुत्री को एक साथ सिनेमा का आनंद उठाने को ध्यान में रखते हुए फिल्में बनाई गई. राष्ट्रीयता और समाजिक रस्मों रिवाजों व भारतीय उसूलों पर आधारित फिल्में बनी आम लोगों के लिए बनी फिल्मों की इससे बड़ी खासियत और क्या हो सकती है .

60 वें दशक के बाद बदलने लगा बॉलीवुड की तस्वीर तदवीर ,जो लगातार रफ्तार भी पकड़ता गया

भारतीय सिनेमा जगत के एक सौ वर्षों के दौर में करीब 70 वें दशक से बॉलीवुड के तस्वीर और तदवीर में बदलाव दिखने लगा था ,रंगीन फिल्में अपनी रंगरेलियत बिखेरने लगी थी हिंदी फिल्मों का थीम व स्क्रिप्ट में भी बदलने लगा था. फिल्म निर्माण का औचित्य व मकसद भी अतीत की भारतीय फिल्मों से इत्तर होने लगा था. हिंदी सिनेमा पर पश्चिमी फिल्मी स्टाइल का रंग चढ़ना शुरू हो गया था और फिल्मों का व्यवसायीकरण का दौर भी शुरू हो गया था साथ ही बॉलीवुड व भारतीय हिंदी सिनेमा उद्योग फिल्म निर्माण के परंपरागत संस्थागत मूल स्वरूप व उद्देश्य में भटकाव शुरू हो गया था और आने वाले कल में इसकी भयावहता व दुष्परिणाम का भान भी होने लगा था . फिल्म निर्माण के स्तंभ डायरेक्टर , प्रोड्यूसर ,पटकथा लेखक और अदाकारों में मानसिक भटकाव होने लगा था . बॉलीवुड में अस्वस्थ परिवर्तन की बयार बढ़ने लगी थी .

बॉलीवुड में अंडरवर्ल्ड और ड्रग माफिया के एंट्री ने बदल दिया तस्वीर तदवीर

जैसे-जैसे भारतीय सिनेमा उद्योग बॉलीवुड में अंडरवर्ल्ड ड्रग पेडलर्स की एंट्री से बॉलीवुड में अपराधीकरण पांव प्रसारने लगा वैसे वैसे इंडस्ट्री का फिजा भी तेजी से बिगड़ने लगा अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद और उसके गुर्गों ने बॉलीवुड पर अपना अघोषित कब्जा जमा लिया और इंडस्ट्री उसके हाथ की कठपुतली बन गई . कला का मंदिर बॉलीवुड अपराध व गैरकानूनी व्यवसाय की नगरी में तब्दील हो गया ,बॉलीवुड का संचालन डॉन दाऊद और उसके गुर्गों की इच्छा पर होने लगा ,आहिस्ता आहिस्ता बॉलीवुड विभिन्न आतंकियों का अड्डा बन गया. बॉलीवुड इंडस्ट्री पर अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम और ड्रग्स पेडलर्स का परचम लहराने लगा और अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम भारत का मोस्ट वांटेड होने के बावजूद बॉलीवुड में अपना खोटा सिक्का भंजाने लगा . बॉलीवुड के प्रचलित कई विगत अभिनेता ,अभिनेत्री दाऊद के इशारे पर उसके दरबार में भय और दौलत व दाऊद से सनिकटता के चक्कर में हाजिरी लगाने की बात दूर ठुमके भी लगानें से संकोच परहेज नही कर रहे हैं .मुंबई बम ब्लास्ट का सरगना और भारत का मोस्ट वांटेड डॉन दाऊद इब्राहिम से कथित बॉलीवुड के दिग्गजों का संबंध से बड़ा अपराध और क्या हो सकता है , जिसने दाऊद की नहीं मानी सजा में उसे मौत मिली कैरियर बर्बाद करवा दिया गया , दाऊद इब्राहिम ने अपनी चाहत को अंजाम या तो अपने गुर्गों व बॉलीवुड के अपने खास व वफादार दिग्गज शख्सियतों से दिलवाया व दिलवा रहा है, इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है ?

रहना खाना कमाना भारत में और गीत गाना पाकिस्तान व मुस्लिम देशों का

बॉलीवुड का सबसे बड़ी विडंबना तथाकथित कलाकार अदाकार व शख्सियत बने हुए हैं जो भारत में रह खा और कमा रहे हैं दोनों हाथ से दौलत और शोहरत बटोर रहे हैं वक्त आने पर राग पाकिस्तान व मुस्लिम देशों का अलाप रहे हैं. भारत रहने जैसा देश नहीं रह गया का इजहार करते हैं और बड़ी बेशर्मी से भारत में ही गुजर बसर कर रहे हैं जबकि भारत विरोधी विचारधारा वाले ऐसे शख्सियत को भारत रहने का कोई अधिकार नहीं बनता है. ऐसे लोगों को खुद भारत छोड़ कर चला जाना चाहिए फिर भी लेटे हुए हैं. चुकी यह बखूबी समझते जानते हैं कि भारत जैसा प्यारा देश कहां मिलेगा ? अपार दुख और हैरत की बात है की राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त अदाकारा कंगना रनौत को सत्य का साथ देने के गुनाह में महाराष्ट्र सरकार और शिवसेना ने मुंबई नहीं आने का फरमान सुनाया था वहीं महाराष्ट्र की तत्कालीन और वर्तमान सरकारों और शासन प्रशासन की ऐसे भारत विरोधी विचार वाले शख्शो के प्रति नरमी का रुख व कुम्भकर्णी नींद की वजह राष्ट्र प्रेमियोँ व भक्तों के लिए घोरगंभीर चिंता का विषय बनना लाजमी है. समय समीप आ गया है देशवासी इस पर भी जल्द ही महाराष्ट्र सरकार और शासन प्रशासन से सवाल जरूर पूछेंगे .

वर्तमान बॉलीवुड बना विभिन्न आतंकियों का ठिकाना

भारतीय हिंदी फिल्म उद्योग बॉलीवुड वर्तमान में राष्ट्र समाज विरोधी और गैरकानूनी आतंकवादियों का स्थाई ठिकाना बन गया गया है .सत्य की लड़ाई लड़ रहे वीरांगना अभिनेत्री कंगना रनौत ने ट्वीट कर बॉलीवुड में फन फैलाए आतंकियों की गिनती दी है. इसमें भाई भतीजावाद आतंकवाद ,ड्रग माफिया आतंकवाद ,लिंगभेद आतंकवाद ,धार्मिक और क्षेत्रीय आतंकवाद ,विदेशी फिल्मों का आतंकवाद , पायरेसी आतंकवाद ,मजदूरों के शोषण से जुड़ा आतंकवाद और प्रतिभा के शोषण का आतंकवाद शामिल है. इससे बॉलीवुड को बचाने का आह्वान भी किया गया है ,चुकी इसका सीधा सीधा गंभीर असर बॉलीवुड की अस्मिता और अस्तित्व के साथ-साथ स्वदेशी कला प्रतिभा जागरण मुहिम पर पर पढ़ रहा है प्राप्त विश्वसनीय सूत्रों नै भी कंगना रनौत के इस बयान व अभिव्यक्ति की पुष्टि की है .

क्या है इस पर आम प्रतिक्रिया

विभिन्न तबके से सामने आ रही प्रतिक्रियाओं से यह सूस्पष्ट हो रहा है कि भारतीय सिनेमा व बॉलीवुड भारतीय आर्थिक उपलब्धता (नेशनल रेवन्यू ,)का एक सुदृढ़ रीढ़ व मजबूत स्रोत्र है ,इससे अरबों रुपया सरकारी खजाना को प्राप्त हो रहा है वही बॉलीवुड के कंधे पर राष्ट्र समाज की बेहतरी की जिम्मेवारी भी सौपी गई है. आम अवधारणा है कि भारतीय सिनेमा जगत के अतीत का सफर जितना सुहावना रहा बॉलीवुड का वर्तमान सफर की तस्वीर उतना ही बदतर भयावह और डरावना प्रतीत हो रहा है जो आने वाले त्रासदी पूर्ण कल का इशारा कर रहा है .वर्तमान हिंदी फिल्मों का मंजर यह है कि पूरा परिवार एक साथ बैठकर फिल्म देखने का हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है बॉलीवुड की वर्तमान फिल्में समाज और विशेष रुप से युवा पीढ़ी पर बुरा व नाकारात्मक असर छोड़ रही है ,संस्कार खराब कर रही है समाज में अपराध और अपराधीकरण विस्तार पकड़ रहा है इसके लिए बॉलीवुड नहीं इसके तथाकथित फिरकापरस्त ताकतें पूरी तरह जिम्मेदार ठहरते हैं. समय रहते इन आसुरी शक्तियों पर लगाम नहीं लगा तो कला प्रतिभा व हुनर का इस पवित्र मंदिर बॉलीवुड को आतंक व आतंकवादियों का अड्डा बनने से रोक पाना मुश्किल ही नहीं टेढ़ी खीर बन जाएगा. आम लोगों की भी मांग है कि सरकार शासन प्रशासन समय रहते इस पर लगाम लगाएं जो भारतीय सिनेमा जगत के अस्तित्व और अस्मिता की तक्ष व बचाव के लिए निहायत जरूरी भी ठहरता है .

वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार प्रो0 धीरेंद्र नाथ सिंह

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