हंटरगंज/चतरा: पुरातत्वविद ,इतिहासकार व धर्मगुरुओं के मतानुसार किसी भी तीर्थ व पर्यटनस्थल की पौराणिकता व ऐतिहासिकता का मापदंड व प्रमाण पुरातात्विक स्मृति शेष होते हैं. चतरा जिला के हंटरगंज प्रखंड स्थित अंतरराष्ट्रीय ख्याति का तीर्थ सह पर्यटनस्थल और सनातन ,बौद्ध एवं जैन धर्मों का संगम व समन्वय स्थल कौलेश्वरी पहाड़ पुरातात्विक अवशेषों का एक समृद्ध धरोहर है.

कौलेश्वरी पहाड़ श्रद्धा भक्ति व विश्वास का अटूट केंद्र.. पुरातत्वविदो एवं विज्ञान के लिए जिज्ञासा और खोज भी है.

कौलेश्वरी अपने दामन में प्रचुर पुरातात्विक स्मृति शेष संजोए हुए हैं ,जो अद्भुत , विलक्षण और चमत्कारी होने के साथ-साथ सनातन ,बौद्ध एवं जैन धर्मावलंबियों के लिए अपार आस्था , श्रद्धा भक्ति व विश्वास का केंद्र भी है. राष्ट्रीय,अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों के लिए अति दर्शनीय ,मनोहारी और पुरातत्वविदों व विज्ञान के लिए जिज्ञासा व खोज की वस्तु है. कौलेश्वरी पहाड़ पर उपलब्ध एक दर्जन से ऊपर पुरातात्विक अवशेषों में कुछ पर सनातन , बौद्ध व जैन धर्मावलम्बियों का अपने अपने धर्मशास्त्रों के मुताबिक अलग अलग दावा और धार्मिक महत्व है. धर्मावलंबी अपने अपने धर्म के अनुसार इसकी पूजा अर्चना भी करते हैं.

कौलेश्वरी तीर्थ स्थल की सबसे बड़ी विशेषता , सकरात्मकता यह है कि इसे लेकर तीनों धर्मों के धर्मावलंबियों में कोई अंतर्विरोध या विवाद नहीं है..

कौलेश्वरी तीर्थ स्थल की नैसर्गिकता , विलक्षणता के आधार पर ही पुरातत्वविद , पुरावलेख , धर्मावलम्बी व धर्माधिकारी कौलेश्वरी तीर्थ स्थल को झारखण्ड का मिनी वैष्णो देवी व तिरुपति का दर्जा देते हैं । सनातन धर्मशास्त्र के अनुसार कौलेश्वरी तीर्थ स्थल शक्ति और सिद्ध पीठ है. उपलब्ध एक दर्जन से ऊपर पुरातात्विक अवशेषों में कई स्मृतिशेष अलौकिक महत्व के हैं. जिसका गाथा सनातन , बौद्ध व जैन धर्मशास्त्रों में भी उल्लेखित है. इनका अस्तित्व व सम्बंध त्रेता , द्वापर ,महाभारत काल व बौद्ध एवं जैन धर्मकाल व प्रागेतिक इतिहास से जुड़े होने का प्रमाण हैं.

कष्ट हरने वाली मनोकामना सिद्ध करने वाली संतानदायिनी के दर्शन मात्र से श्रद्धालुओं के मस्तक स्वतः झुक जाते हैं..

इसमें काले दुर्लभ पत्थर में माता कौलेश्वरी की तेजवंती प्रतिमा के दर्शन मात्र से ही श्रद्धालुओं का मस्तक स्वतः झुक जाता है. हिंदुओं का महान पूजा ग्रंथ दुर्गा सप्तशती के कवच पाठ के 28 में स्त्रोत में माता सती के कोख से अवतरित चतुर्भुजी कन्या माता कौलेश्वरी की उपमा कुक्षो रक्षित कौलेश्वरी की है. भक्तों का हर कष्ट हरने और मनोकामना सिद्ध करने वाली देवी की हैं. वैदिक मान्यता में माता कौलेश्वरी संतानदायनी और कुक्ष रक्षति देवी हैं. धर्मग्रन्थों के मुताबिक महाभारतकालीन राजा विराट व समकालीन कोलासुर की कुलदेवी होने का भी उल्लेख है.

कौलेश्वरी सरोवर एक अबूझ पहेली..

1575 फिट उच्चे शिखर पर अवस्थित अति प्राचीन हजार फीट चौड़ा ,नौ सौ फीट लंबा और तीस फिट गहरा सदाबह सरोवर प्रकृति का एक अनुपम उपहार है इसका जल औषधीय गुणों से युक्त है;जल स्रोत भी प्रकृति प्रदत्त है. .सरोबर में जल कहां से आता है पुरातत्वविदों के लिए भी अबूझ पहेली बनी हुई है. गंदा होने के बाद भी पानी गंगाजल की तरह संक्रमित नहीं होता..पवित्र माना जाता है. अर्जुन वाण गंगा से हमेशा पानी रिसता है. रिसते जल में चावल की पोटली डालने से सीझ जाने की भी मान्यता है . अज्ञातवास के दौरान गंगाजल की जरूरत के तहत इसका प्रादुर्भाव धनुर्धर अर्जुन द्वारा अपने वाण से किये जाने की मान्यता है.

बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए खासा महत्व है..

मड़वा मड़ई की मान्यता महाभारत काल के अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु और राजा विराट की पुत्री उतरा के विवाह मंड़प स्थल की है. वही बौद्ध धर्मावलम्बियों के लिए यह जीवित अवस्था मे ही अंतिम संस्कार का स्थल है. बौधिष्ठ इस स्थल पर नाखून बाल कटाकर अपना अंतिम संस्कार कराते है. बौद्ध धर्म शास्त्र में कौलेश्वरी पहाड़ बौद्ध धर्मावलंबियों का विश्व के आठ मान्यता प्राप्त अंतिम संस्कार स्थलों में एक जिकसो रूमा दुर्थो है. इसे मांडवा मांडवी के नाम से भी जाना जाता है.

अद्भुत है अतुलनीय है, चट्टान एक नोक पर है तो गहराई का कोई माप नहीं..

एक शिलाखंड के छोर पर टीका विशाल चट्टान को भीमवार होने की मान्यता है.. जिसे महाबली भीम ने किसी प्रयोजन से उठाकर उक्त विशालकाय चट्टान को फेंका था,जो एक शिलाखंड की नोक पर गिरा था और आज तक वही स्थिर है. चुंबकीय शक्ति से विशाल चट्टान को शिलाखंड के एक छोर पर टिके रहने का अनुमान लगाया जाता है. इस विशाल चट्टान और इससे सटे दूसरे चट्टान के बीच भाग में पतली सुराख है ,जिसकी गहराई अभी तक मापी नहीं जा सकी है. इसके भूतल में जल प्रवाहित होने की भी चर्चा है.

तीन धर्मों का समागम .. जैन धर्मावलंबी की भी अपनी मान्यता

एक गुफा में ध्यानी मुद्रा की प्रतिमा को हिन्दू धर्मावलम्बी भगवान भैरवनाथ ,बुद्ध धर्मावलम्बी भगवान बुद्ध और जैन धर्मावलम्बी भगवान शीतलनाथ की तपोध्यान की प्रतिमा मानते और अपने अपने धर्मानुसार पूजा अर्चना भी करते है. सप्त ऋषि गुफा को सनातन धर्मावलम्बी सात महर्षियों ,बौद्ध सात बौद्ध भिक्षुओ और जैन धर्मावलम्बी सात तीर्थंकरों का तपस्थल मानते है..वही चट्टानों व शिला खंडों पर उत्कीर्ण विभिन्न मुद्राओं की मूर्तियों के अस्तित्व के प्रति भी सनातन ,बौद्ध और जैन धर्मावलंबियों का अपना अपना दावा और मान्यता है.

पर्यटक हो श्रद्धालु हो भारतीय हो विदेशी हो बड़ी संख्या में लोग कौलेश्वरी आते हैं..

कौलेश्वरी पहाड़ की नैसर्गिक छटा भी निराली व मनोहारी है ,जो पर्यटकों को बरबस अपनी और आकर्षित करता है. प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में विश्व के बौद्ध धर्म प्रधान देशों के धर्मावलम्बी पूजा अर्चना और अंतिम संस्कार कराने कौलेश्वरी पहाड़ पहुचते हैं .जैन धर्माववलमबी भी बड़ी संख्या में अपने तीर्थंकरों की पूजा आराधना के निमित पहुचते है ।रोज हजारों की संख्या में सनातन धर्मावलम्बियों का पूजा अर्चना व मुंडन संस्कार के निमित आना जाना लगा रहता है।विभिन्न राज्यों व देशों के पर्यटक पुरातात्विक अवशेषों व नैसर्गिक छटा का लुफ्त उठाने कौलेश्वरी पहाड़ पहुचते है.

दशकों दशक कौलेश्वरी पहाड़ उपेक्षित रही है, अवहेलना होती रही, सरकार का उदासीन रवैया रहा.. कायाकल्प की एक आस जगी है; उम्मीद बनी है. सरकार की सकारात्मक पहल हो तो कौलेश्वरी पहाड़ झारखंड पर्यटन में बड़ा नाम, श्रद्धालुओं के लिए खासकर तीनों धर्मों के लिए संपूर्ण भारत में एक पहचान बन सकती है.

कौलेश्वरी तीर्थ स्थल की लोकपिर्यता व अलौकिक महात्म्य का हो प्रभाव है कि 1575 फिट का दुरूह पर्वतारोहण और बुनियादी असुविधाओं के बावजूद लोगों का इसके प्रति आकर्षण ,लगाव व आस्था अटूट बना हुआ है. वहीं विडम्बना है कि दशको तक कौलेश्वरी उपेक्षित बनी रही. गठित कौलेश्वरी विकास प्रवंधन समिति के सतत प्रयास और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की अन्तरलिप्तता ,सक्रियता से अब सरकार व पर्यटन विभाग की नजरे इनायत हुई है . कौलेश्वरी का कायाकल्प व विकास की गाड़ी पटरी पर चढ़ी है… पिछले सरकार द्वारा भी विकास की इबारत लिखी गई है. ..वर्तमान सरकार के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन के बयान की कौलेश्वरी के समुचित विकास के लिए सरकार कृतसंकल्पित है और स्थानीय सांसद सुनील कुमार सिंह और विधायक सह मंत्री सत्यानन्द भोक्ता द्वारा इसके समुचित कायाकल्प के साथ साथ पूर्ण पर्यटनस्थल में तब्दील कराने हेतु केंद्र और वर्तमान झारखंड सरकार का कराया जा रहा लध्यानाकर्षण से कौलेश्वरी के संपूर्ण कायाकल्प व पूर्ण पर्यटनस्थल में तब्दिल होने का चिरप्रतीक्षित सपना को साकार होने का आसार बढ़ा है . यह कहां तक फलीभूत हो पाता है , फिलहाल यह समय के गर्भ में है..

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