केंद्र सरकार के नए 3 कृषि कानून और इसके विरोध में सरकार और किसान के बीच ठनी रार कितना हकीकत कितना फ़साना ? आइए देश के इस ज्वलंत मुद्दे को करीब से समझते हैं..

कृषि के क्षेत्र में भारत

भारत मूल रूप से एक कृषि प्रधान देश है. कृषि क्षेत्र में देश की लगभग आधी श्रमशक्ति कार्यरत है .2015 -16 ( मौजूदा मूल्यों पर )जीडीपी में इसका योगदान 17 .6 % है . 1950 के दशक में जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान जहां 50% था .वही 2015-16 में यह गिरकर (स्थिर मूल्यों पर )15 .4 % रह गया. पिछले कुछ दशकों के दौरान अर्थव्यवस्था के विकास में मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्रों का योगदान तेजी से बढ़ा है , जबकि कृषि क्षेत्र के योगदान में गिरावट हुई है. हालांकि भारत का खाद्यान्न उत्पादन प्रत्येक वर्ष बढ़ रहा है और देश गेहूं चावल दाल गन्ना और कपास जैसी फसलों के मुख्य उत्पादकों में से एक है ,. किंतु अनेक फसलों (प्रति हेक्टेयर जमीन में उत्पादित होने वाली फसल की मात्रा) के मामले में चीन ब्राजील और अमेरिका जैसे बड़े कृषि उत्पादक देशों की तुलना में भारत की कृषि उपज कम है .

क्या है सरकार के 3 नए कृषि कानून और क्यों कर रहे किसान इसका विरोध

केंद्र सरकार ने दिसंबर माह में 3 नए कृषि विधेयक लाई है. जो राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद कानून बन चुके हैं (1 ) किसान उपज व्यापार एवं वाणिज्य ( संवर्धन एवं सुविधा ) विधेयक 2020 ‘- इसके पीछे उद्देश बताया गया है कि विभिन्न विधानसभाओं द्वारा गठित कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएससी ) द्वारा विनियमित मंडियों से बाहर भी कृषि उपज की बिक्री की अनुमति होगी . इस कानून के जरिए अब एपीएससी मंडियों के बाहर भी किसान अपनी उपज ऊंचे दामों पर बेच पाएंगे. निजी खरीदारों से बेहतर दाम प्राप्त कर सकेंगे , लेकिन सरकार ने इस कानून के जरिए एपीएससी मंडियों को एक सीमा में बांध दिया है और एआरएमसी के स्वामित्व वाले अनाज बाजार मंडियों को उन बिलों में शामिल नहीं किया गया है . कारपोरेट घरानों बिना किसी पंजीकरण व कानून के दायरे में आये किसानों की उपज खरीद बेच सकते हैं .

क्या है आपत्ति

इस बिल से किसानों को डर है कि सरकार इस बिल के जरिए धीरे धीरे कृषि उपज न्यूनतम मूल्य खत्म कर सकती है ,जिसपर सरकार किसानों से अनाज खरीदती है

अनुबंध खेती


(2) किसान (सशक्तिकरण एवं संरक्षण ) मूल्य आश्वासन एवं अनुबंध विधेयक :- इसके तहत अनुबंध खेती /कांट्रैक्ट फार्मिंग की इजाजत दी गई है इसके जरिए किसान की जमीन को एक निश्चित राशि पर पूंजीपति व ठेकेदार किराए पर लेगा और अपने फसल का उत्पादन कर बाजार में बेचेगा .

किस बात का है संशय

किसानों का इस बिल पर पुरजोर आपत्ति व विरोध है कि फसल की कीमत तय करने व विवाद की स्थिति में बड़ी कंपनियां इसका लाभ उठाने का प्रयास करेंगी और छोटे किसानों के साथ समझौता नहीं करेंगी .

आवश्यक वस्तु


(3) आवश्यक वस्तु ( संशोधन ) विधेयक ‘– इस कानून के तहत अनाज आलू प्याज दलहन तिलहन जैसे खाद्य पदार्थों के उत्पादन आपूर्ति एवं वितरण को विनियमित किया गया है यानी इसके तहत इस तरह के खाद्यान्न को आवश्यक वस्तु की सूची से बाहर करने का प्रावधान किया गया है. युद्ध या प्राकृतिक आपात स्थितियों को छोड़कर भंडारण की कोई सीमा नहीं रह जाएगी .

किस बात की है दुविधा

इस बिल पर किसानों की आपत्ति है कि यह बिल न सिर्फ किसानों के लिए बल्कि आमजन के लिए भी भारी खतरनाक होगा . कृषि उपज बढ़ाने की कोई सीमा नहीं होगी .उपज जमा करने और वापस लेने के लिए निजी निवेश को छूट होगी और सरकार को पता नहीं होगा कि किसके पास कितना स्टॉक है और कहां है ?

किसानों की दलील है कि केंद्र सरकार के नए 3 कृषि कानून किसान के हित में नहीं है .इससे कृषि क्षेत्र का निजीकरण होगा व कारपोरेट घरानों को फायदा होगा .

क्या है किसानों की 5 मांगे


किसानों की केंद्र सरकार से मुख्य मुख्य मांग किसानों के हित के विपरीत सरकार द्वारा लागू नए तीन कृषि विधेयक वापस लेने की है लिखित रूप में एमएसपी और कन्वेंशनल फूड ग्रेन सिस्टम खत्म नहीं करने का आश्वासन देने की है . क्योंकि ये विधेयक किसानों के हित में नहीं है और कृषि के निजीकरण का प्रोत्साहन देने वाला है इससे केवल और केवल होर्डर्स और कारपोरेट घरानों को ही फायदा होगा . किसानों की मांग है 2003 के स्थान पर लाए गए (संशोधित ) बिजली बिल 2020 को वापस लेने की . किसानों का आरोप है कि बिजली वितरण प्रणाली का निजीकरण किया जा रहा है. इस बिल से किसानों को मिल रही सब्सिडी व फ्री बिजली सप्लाई की सुविधा समाप्त हो जाएगी . पांचवी मांग खेत का अवशेष ( पराली ) जलाने पर किसान को 5 साल का जेल और एक करोड़ रुपए का जुर्माना के प्रावधान को निरस्त व समाप्त करने की है विशेष रूप से पंजाब के किसानों की मांग खेत के अवशेष (पराली ) जलाने के आरोप में गिरफ्तार किसानों को रिहा करने की है .
दूसरी तरफ केंद्र सरकार का रुख किसानों से वार्ता करने वह बीच का रास्ता निकालने के तौर पर सकारात्मक तो है लेकिन केंद्र सरकार अपने तीन नए कृषि विधेयक व कानून को लागू कराने के फैसले पर फिलहाल अडिग बनी नजर आ रही है . 3 नए कृषि कानूनों को वापस लेने की बात इत्तर फिलहाल इसमें बदलाव व संशोधन करने के मूड में नहीं दिख रही है . नतीजा है कि केंद्र सरकार और विशेष रुप से हरियाणा पंजाब दिल्ली आदि किसानों के बीच टकराव निरंतर बढ़ता जा रहा है वार्ताएं विफल हो रही हैं . सुकून की बात है कि फिर भी वार्ताओं का दौर जारी है ..

क्या राजनीतिक इतिहास का अध्याय बन सकता है सरकार और किसान के बीच टकराव

केंद्र सरकार के नए 3 कृषि विधेयक के खिलाफ किसानों का आंदोलन ढाई महीने से ऊपर का सफर तय कर चुका है . सरकार और आंदोलित किसानों के बीच समझौता का कोई रास्ता तय नहीं हो पाया है. हलांकि सरकार और किसान दोनों ने अपने रुख में समय और हालात के हिसाब से कुछ बदलाव किए हैं . 26 जनवरी को आहत करने वाली घटना पर किसान खुद को शर्मसार महसूस किए . किसान आंदोलन के मुखिया राकेश टिकैत ने इसपर गिरफ्तारी देने की ठान ली थी दृष्टिगोचर होने लगा था कि किसान आंदोलन अवसान की ओर बढ़ रहा है , किन्तु किसान आंदोलन के अगुआ राकेश टिकैत ने घोषणा कर दी कि मैं अपने लोगों को भरने पीटने के लिए छोड़कर नहीं जाऊंगा अपने गांव का जल भी ग्रहण नहीं
करूंगा और अंत में राकेश टिकैत के आंसुओं से मुरझाता किसान आंदोलन फिर से हरित हो उठा. उदाहरण किसानों द्वारा आहूत शनिवार को राष्ट्रव्यापी चक्का जाम ,जो शांतिपूर्ण संपन्न हुआ कहीं अधिक तो कहीं थोड़ा असर दर्ज किया गया . उम्मीद के अनुरूप पंजाब और हरियाणा में इसका सर्वाधिक असर दिखा . अब हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश में आंदोलन के पक्ष में महापंचायत होने लगी हैं. पंजाब हरियाणा दिल्ली के किसान सड़कों पर आसन जमाए हुए हैं दिल्ली की सीमा पर जिस तरह की घेराबंदी की गई है इसका चौतरफा असर पड़ रहा है. कामगार काम पर जाने के लिए मिलो का चक्कर काटने के लिए मजबूर हैं कारखानों में मजदूरों और माल के आवाजाही में गिरावट आई है. एंबुलेंस को भी रास्ता हासिल नही हो रहा है बाजार में सामान को किल्लत से महंगाई बढ़ गई है .आसपास के इलाकों में लंबे समय से इंटरनेट सेवा बंद है इस कारण बच्चे नही पढ़ पा रहे हैं जबको इम्तिहान सिर पर है किसान आंदोलनकारियों को पानी और शौचालय के लिए भारी जद्दोजहद से गुजरना पड़ रहा है , फिर भी आंदोजनकारी किसान आसन जमाये बैठे हुए हैं .इस किसान आंदोलन की सबसे अहम व काबिले गौर विषय है कि 26 जनवरी की घटनाओं से पहले किसानों ने सफलतापूर्वक राजनीतिज्ञों व राजनीतिक गतिविधि से दूरी बनाए रखा तब तक आंदोलन का स्वरूप व तस्वीर इत्तर दिखा , आज सियासत महारथियों से संपर्क साधने लगे हैं .राजनीति के प्रवेश ने किसान आंदोलन के मसले को उलझा दिया है विपक्षी दल सत्तारूढ़ दल के कृषि विधेयकों का विरोध कर रहे हैं .इनमें कई तो पहले इसका समर्थन कर चुके हैं .आंदोलन में वैसे भी कई चेहरे हैं जो लोकसभा चुनाव में सत्तारूढ़ गठबंधन के साथ खड़े थे. पुरानी कहावत है कि राजनीति अपनी आवश्यकता के मुताबिक अपना मुखौटा बदलती रही है . वैसे भी प्रसिद्ध कहावत है कि राजनीति और युद्ध में कुछ भी बुरा व गलत नहीं होता है .

सरकार कृषि क्षेत्र में सुधार का कर रही दावा

एक तरफ किसान आंदोलन में शामिल विभिन्न संगठन सरकार के नए 3 कृषि विधेयकों किसानों के खिलाफ करार देते हुए पुरजोर विरोध कर रहे हैं. किसान आंदोलनरत है कृषि के क्षेत्र में ग्लोबल फार्मिंग के हिसाब से अपेक्षित सुधार जरूरी प्रतीत होता है .सरकार भी इन कृषि कानूनों के जरिए किसानों के हित व कृषि के क्षेत्र में अपेक्षित सकारात्मक व प्रभावोत्पादक सुधार लाने का दावा कर रही है. भले ही कृषि के क्षेत्र में अग्रणी राज्य विशेष रुप से पंजाब हरियाणा दिल्ली आदि के किसान इसे नहीं समझ पा रहे हैं, तो सत्ता नायकों को भी किसानों को आश्वस्त करने के लिए कुछ ठोस उपाय खोजना जरूरी प्रतीत होता है . दूसरी ओर चली आ रही पुरानी परंपरा व परिपाटी के तहत विपक्षी पार्टियां द्वारा सत्तारूढ़ दल व सरकार का हर अच्छे बुरे कार्य का विरोध वाली रणनीति के तहत सरकार व सत्तारूढ़ दल के खिलाफ़ जारी किसान आंदोलन को खाद पानी देना कोई हैरत व आश्चर्य विषय भी नहीं है हालांकि इसका कितना राजनीतिक फायदा होगा यह तो आगामी चुनाव परिणाम से स्पष्ट होगा.

राष्ट्रदोही कार्य की कोई गुंजाइश संविधान में नहीं है


लोकतंत्र में मांग को लेकर शांतिपूर्ण धरना आंदोलन व अभिव्यक्ति संवैधानिक अधिकार है, किंतु इस दौरान कोई अशांति तोड़फोड़ हिंसा, खूनखराबा जैसे राष्ट्रद्रोही कार्य की कोई गुंजाइश संविधान में नहीं की गई है . आंदोलनकारी किसानों और इनके नेताओं को इसे समझने की अहम जरूरत है . धरती से जुड़े धरती पुत्रों का यह आंदोलन को राजनीति से दूर रखना ही श्रेयष्कर होगा क्योंकि यह बात लुकी छुपी नहीं है कि लंबा आंदोलन कभी-कभी अहित कर जाता हैं और इतिहास का काला अध्याय भी बन जात हैं .26 जनवरी की घटनाएं इसका उदाहरण है .आंदोलनकारी किसानों और इनके नेताओं को इससे सावधान रहने की भी जरूरत है ..

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