एक बिहारी विधायक ऐस भी ,जो चार बार विधायक बनने के बावजूद अपना एक अदद घर भी नही बना पाया ,ताउम्र किराए के मकान में रहे , गरीबो का हमदर्द और सामंती विचारधारा का धुर विरोधी बने रहे ,भले ही इसकी कीमत 107 गोलियां खाकर जान देकर चुकानी पड़ी .

चर्चा छिड़ती है तो उनका नाम पूरे सम्मान व गौरव के साथ गूंजता है

1980 में जीते पहला चुनाव और फिर जीतते ही चले गए

सिद्धान्तों असूलों से किसी भी कीमत पर कभी कोई समझौता नही किया

एक रुपए के सिक्के से जिन्हें वोट मिलने का पूर्वाभास हो जाता था

पुर्णिया विधायक थे वह अजीम शख्सियत

पूर्वज पाकिस्तान से विभाजित वर्तमान बांग्लादेश से वतौर रिफ्यूजी पूर्णिया में बसे थे

लगातार चार चार विधायक चुने गए अजीत सरकार उर्फ अजीत दा . सीमांचल के राजनीतिक क्षितिज का एक जनप्रिय ,अति लोकप्रिय चमकता दमकता उदयीमान सितारा व कट्टर वामपंथी विचारधारा के अनुयायी और सामंतवाद के धुर विरोधी शख्शियत थे अजित सरकार. पूर्णिया के करीब करीब आमजन के अजित दा थे. इनका जन्म वर्ष 1947 में गणतंत्र भारत के बिहार राज्य के पूर्णिया शहर में हुआ था . इनके पिता पूर्णिया के चर्चित एवं लोकप्रिय होमियोपैथ डॉक्टर थे. इनके पूर्वज पाकिस्तान से विभाजित वर्त्तमान बंगलादेश से वतौर रिफ्यूजी पूर्णिया में आकर बसे थे सादगी ,सद्व्यवहार इमानदारी जन और समाज सेवा परोपकार इन्हें खानदानी विरासत में मिला था. बंगाली होने के कारण क्रांति सतत संघर्ष , निडरता , निर्भीकता ,स्पष्टवादिता इन्हें परिवारिक विरासत में मिला था . बंगबंधु होने के कारण क्रांति व संघर्ष इनके रग रग में समाहित था ये विचार और कर्म से सच्चे वामपंथी और सोच और ख्याल से सामंती प्रथा व व्हवस्था के धुर विरोधी थे अजीत सरकार उर्फ अजीत दा .

1977 में किया था अपने राजनीतिक सफर व कैरियर का श्रीगणेश

वामपंथी अजीत सरकार ने अपने राजनीतिक सफर व कैरियर का श्रीगणेश 1977 निहार विधानसभा चुनाव में पूर्णिया विधानसभा सीट से वतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव मैदान में पुर्णिया की राजमीटीं में अपनी दावेदारी पेश कर की थी. चुनावी नतीजा में 12,हजार से अधिक मत पाकर तीसरे स्थान पर रहे थे ,किंतु हिम्मत और हौसला नहीं छोड़ा था उल्टे दोगना उत्साह उमंग और जोश खरोश के साथ जनता की सेवा और क्षेत्रीय समस्याओं के समाधान में प्राणपण से जुटे रहे. जो रंग भी लाया और उपलब्धियों व लोकप्रियता की कुंजी भी बना 1980 के विधानसभा चुनाव में अजीत सरकार पूर्णिया विधानसभा सीट से वामदल उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े और विजयी हुए जीत का सिलसिला शुरू हुआ जो पीछे मुड़कर कभी नही देखा लगातार चार बार विधायक चुने जाते रहे कभी पराजय का मुंह नहीं देखा. अपराजेय का सेहरा इनके सिर बंधता रहा चुनावी रन में निष्कपट निष्कंटक योद्धा बने रहे. इसी बीच 14 जून 1998 को गोली मारकर इनकी हत्या कर दी गई.

अपने लिए एक अदद मकान भी नही बना पाए अजीत सरकार

दृष्टिगोचर है कि अंगुली पर गिनती को छोड़ जिसको एक बार भी विधायक व सांसद बनने का मौका मिल जाता है उसकी कई पीढियां चिंता व अभाव मुक्त हो जाती है . अजीत सरकार की तस्वीर व तदवीर ठीक इसके उल्टी थी चार बार विधायक चुने जाने के बाद भी अपने व अपने परिवार के लिए एक अदद साधारण मकान तक बनवा नही सके. 650 रुपये माहवारी किराया का मकान आशियाना बना रहा. बड़ी खाशियत रही कि परिवार ने भी कभी इसके लिए कोई गिला शिकवा भी नही किया उनकी भावनाओं इमानदारी सूचरित्रता को महत्व देते रहे. सर्वजन हिताय सबजन सुखाय विचारधारा धुन के पक्के अजित सरकार के चेहरे पर कभी इसका कोई लालसा भी नही दिखा .इनका मूलमंत्र कबीरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ जो धर जारे आपना चले हमारे साथ बना रहा .जीवन पर्यंत कबीरपंथी बने रहे. ।

लिप्सा अहंकार उन्हें छू तक नही सका था

सूत्र बताते है कि लिप्सा और अहंकार चार बार विधायक चुने जाने के बाद भी अजित सरकार को छू तक नहीं पाया था. इससे कोसो दूरी बनाए रखा उन्हें अहंकार था भी तो अपने सिद्धान्त ,उसूलों व विचारधाराओं का. लिप्सा भी था तो जनसेवा व अपने विधानसभा क्षेत्र और जनता के उम्मीद व विश्वास भरोसे की कसौटी पर खरा उतरने का. सूत्रों को माने तो वाम नेता अजीत सरकार और पुर्णिया का अजीत दा ने कभी भी अपने सिद्धान्तों असूलों से किसी भी कीमत पर कभी कोई समझौता नही किया .

चुनाव लड़ने औऱ वोट मांगने का था अपना अनोखा फॉर्मूला

सूत्रों के मोताबिक अजीत सरकार का चुनाव प्रचार का तरीका औरों से अलग था इन्हें तामझाम के प्रचार पर भरोसा नही था और इससे परहेज भी था. गांव कस्बे में जाते थे तो जनसमर्क के बाद किसी भी स्थान पर अपना गमछा व चादर बिछा देते थे और उस पर केवल एक सिक्का डालने का अनुरोध करते थे एक रुपये से अधिक सिक्का देने पर पावंदी थी .कहा जाता है सिक्को से गमछा भरते देर नही लगती थी घर आकर उसे गिनते थे और उक्त क्षेत्र से वोट मिलने का इन्हें पूर्वाभाष हो जाता था.

सीमांचल की राजनीति में बढ़ रहा था बाहुबल और धनबल का दखल

पूर्णिया और आसपास के इलाके को सीमांचल कहा जाता है क्योंकि यह इलाका नेपाल और पश्चिम बंगाल का सीमावर्ती है .सीमांचल के तहत सुपौल ,अररिया
,किशनगंज ,सहरसा ,मधेपुरा और कटिहार आता है. सीमांचल में ही बिहार का अभिशाप माने जाने वाली कोसी नदी भी बहती है. इसके बाढ़ के प्रकोप के चलते यहां लोग गुरबत की जिंदगी जीते हैं ,सीमांचल के पड़ोसी इलाकों के आवोहवा का पूर्णिया के सामाजिक राजनीतिक और चुनावी पृष्ठभूमि पर असर पडना स्वभाविक है. चुनावों में बाहुबल और धनबल क प्रयोग का ग्राफ भी तेजी से उच्चाई पकड़ रहा था. धनाढ्यों और बाहुबलियों में राजनीतिक महत्वकांक्षा व सत्ता के प्रति पिपासा व भुख भी परवान चढ़ने लगा था .इनके इस राह में अजीत दा बड़ा रोड़ा बने हुए थे.इनकी आंखों में खटक रहे थे. इन शक्तियों को विश्वास था कि अजीत सरकार के रहते न तो इनकी दाल गलेगी और न डफली ही बज पाएगी .

14 जून को 107 गोली दाग कर दी गई हत्या

वाम विचारधारा के कट्टर समर्थक और सामंतवाद और लोकतांत्रिक चुनाव में बाहुबल व धनबल के प्रयोग के धुर विरोधी थे विधायक अजीत सरकार. ये इन ताकतों की आंख का काटा और किरकिरी बने हुए थे ,रास नहीं आ रहे थे .14 जून 1998 को पूर्णिया में गोली मारकर इनकी नृशंस हत्या कर दी गई थी ,जब ये एक पंचायत कर लौट रहे थे . इनपर 107 गोली दागी गई थी . एके -47 का प्रयोग हुआ था . इनकी हत्या पर पूर्णियां में भारी आक्रोश उभरा था और जन शैलाब सड़क पर उतर गया था भारी रोषपूर्ण प्रदर्शन भी हो रहा था, स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई थी. तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को पूर्णिया आना पड़ा था लालू प्रसाद ने अजीत सरकार के बेटे अमित सरकार के बैसाखी के सहारे बड़ी मशक्कत के बाद भीड़ को नियंत्रित कर पाए थे हत्या का आरोप राजद के पूर्व सांसद पप्पू यादव एवं राजन तिवारी और अनिल यादव एवं अन्य बाहुबली पर था . सीबीआई ने इनपर चार्जसीट कर दिया था पटना हाईकोर्ट ने साक्ष्य के अभाव में पप्पू यादव को बरी कर दिया था. सीबीआई ने हाइकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी पेश किया ,इस जघन्य हत्याकांड में आज तक फैसला नहीं आया पुर्णिया के बदलते सामाजिक राजनीतिक हालात से दुखी होकर अजीत सरकार के पुत्र अमित सरकार आस्ट्रिया चले गए. इस तरह पुर्णिया की राजनीति के माइल स्टोन का अवसान भी हो गया .फिर भी पुर्णिया में राजनीति व चुनावी बयार बहती है व चर्चा छिड़ती है अजीत सरकार व पुर्णिया के अजीत दा का नाम पूरे सम्मान व गौरव के साथ गूंजता है.

वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार प्रो0 धीरेंद्र नाथ सिंह

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