“अभूतपूर्व संकट में अप्रत्याशित चुनौतियां हैं” अपनी जान खुद बचानी है..

कोविड-19 वैश्विक महामारी संक्रमित वायरस का विस्तार सरकार की निगरानी एवं उपचार के प्रयासों के लिए अप्रत्याशित चुनौती बन गया. सरकार की कार्ययोजनाएं कागजी पन्नों तक ही सीमित रह गई. कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर जिसकी आक्रमकता अनियंत्रित हो परिवारों की खुशियां छीनने लगी ,लोग अपनों से बिछड़ने लगे. अपनों से बिछड़ने का गम ताउम्र के लिए परिजनों को असहनीय पीड़ा दे रहा था.

मालूम नहीं आप देख पाए या नहीं

2021 के संपूर्ण घटनाक्रम में जो बातें प्रत्यक्ष रूप से व प्रमाणिक तौर पर नजर आ रही थी वह सरकार में दूरदर्शी साहस ,इच्छाशक्ति व सक्षम नेतृत्व का अभाव नजर आ रहा था. मालूम नहीं आप देख पाए या नहीं.. अटल सत्य तो यह है सरकार झारखंड की हो या केंद्र की लोगों की जान बचाने में पूरी तरह से नाकाम रही. कोरोना से ज्यादा सरकार की बदहाल व्यवस्था ने लोगों की जान ले ली.

वायरस से ज्यादा सरकार ने लोगों की जान ले ली

2020 से 2021 के बीच में मिले वक्त को सरकार ने जाया किया. आम लोगों की जिंदगी को सुरक्षित करने की दिशा में स्वास्थ्य व्यवस्था में गुणात्मक बदलाव सुनिश्चित किया जा सकता था , युद्धस्तर स्तर पर व्यापक प्रयासों से सुधार कर मृत्यु दर को कम किया जा सकता था. जीवन रक्षक दवाइयों से लेकर अस्पताल में ऑक्सीजन युक्त बेड की सुनियोजित व्यवस्था उसकी उपलब्धता सुनिश्चित हो सके इसके लिए सरकार के पास काफी समय था एवं मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए बहुत कुछ किया जा सकता था, इन प्रयासों से कई जिंदगी बच जाती..मगर सच्चाई तो यही है 130 करोड़ की आबादी वाले देश में कुछ लाख लोग मर जाएंगे तो सरकार की असंवेदनशीलता पर भला क्या फर्क पड़ जाएगा..? जैसा मैंने कहा दूरदर्शिता ,इच्छाशक्ति एवं सक्षम नेतृत्व हर मोर्चे एवं मौके पर सरकार विफल रही , वायरस से ज्यादा सरकार ने लोगों की जान ले ली.

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